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जब संसद में उठी 10 मिनट डिलीवरी की सच्चाई वर्कर्स की जान की कीमत पर नहीं चलेगी फास्ट सर्विस!

राज्यसभा में आप नेता राघव चड्डा का भावुक लेकिन सख्त बयान एक बार फिर उन गिग वर्कर्स की कठिन जिंदगी को सामने ले आया, जिनकी वजह से हमारी रोजमर्रा की जरूरतें सिर्फ “क्लिक” भर पर पूरी हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि 10 मिनट डिलीवरी जैसा कॉन्सेप्ट दिखने में जितना सुविधाजनक लगता है, उतना ही खतरनाक है उन युवाओं के लिए जो बारिश, धूप, ठंड और ट्रैफिक से जूझकर हमारे दरवाजे तक पहुंचते हैं। ये वही लोग हैं जिन्हें राघव ने देश की अर्थव्यवस्था के “अदृश्य पहिये” कहा क्योंकि वे दिखाई नहीं देते, लेकिन पूरा सिस्टम इन्हीं की मेहनत पर चलता है।

चड्डा ने सदन के सामने जो तस्वीर पेश की, वह चौंकाने वाली थी। तेज समय सीमा का दबाव इतना भारी है कि वर्कर्स को ओवरस्पीड करना पड़ता है, रेड लाइट तोड़नी पड़ती है, ट्रैफिक में जोखिम उठाना पड़ता है सिर्फ इसलिए कि कोई ऑर्डर 10 मिनट में डिलीवर हो जाए। और अगर समय पर न पहुंचे, या किसी ग्राहक ने गलत रेटिंग दे दी, तो कंपनी उनकी कमाई काट लेती है, इंसेंटिव रोक देती है या सीधे आईडी ब्लॉक कर देती है। मतलब, जोखिम वर्कर का, नुकसान वर्कर का लेकिन फायदा पूरी तरह कंपनी का।

उन्होंने कहा कि देशभर में लाखों डिलीवरी पार्टनर्स दिन के 12–14 घंटे सड़कों पर दौड़ते रहते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें ना बीमा मिलता है, ना खतरा भत्ता, ना सुरक्षा कवरेज और ना ही किसी स्थायी कर्मचारी जैसी सुविधाएं। एक एक्सीडेंट, एक छोटी गलती या किसी ग्राहक की नाराज़गी और उनका पूरा महीना खराब हो जाता है। यह शोषण नहीं तो और क्या है?

सदन में राघव चड्डा ने साफ कहा कि उन्हें कंपनियों की तरक्की से कोई आपत्ति नहीं, यूनिकॉर्न बढ़ें, स्टार्टअप सफल हों लेकिन यह मुनाफा वर्कर्स की जान की कीमत पर नहीं होना चाहिए। उनकी सबसे बड़ी मांग थी कि 10 मिनट डिलीवरी पर रोक लगाई जाए, ताकि कंपनियों की प्रतिस्पर्धा इन वर्कर्स को मौत के मुंह में न धकेल दे। साथ ही उन्होंने गिग वर्कर्स के लिए मजबूत और बाध्यकारी सुरक्षा कानून बनाने की अपील की, ताकि उनकी आमदनी, बीमा, सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित हो सके।

उन्होंने कहा कि डिलीवरी बॉय सिर्फ “ऑर्डर नंबर” नहीं हैं, वे किसी के घर के बेटे हैं, किसी की उम्मीद हैं, और उन्हें भी एक सुरक्षित जीवन का अधिकार है। पूरे देश का ध्यान अब इस बहस पर है क्या हमारी सुविधा किसी और की मुश्किलों पर आधारित हो सकती है? और क्या सच में समय आ गया है कि हम अपनी डिलीवरी आदतों को इंसानियत की नजर से देखें?

राघव चड्डा के इस मुद्दे उठाने के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है, और लोग कह रहे हैं “फास्ट नहीं, सुरक्षित डिलीवरी चाहिए।” देश की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार वाकई इन अदृश्य पहियों को अधिकारों की रोशनी दे पाएगी।

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