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ओम प्रकाश राजभर का बिहार मिशन! अकेले मैदान में एनडीए को चुनौती

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी तेजतर्रार शैली और बयानों से सुर्खियां बटोरने वाले ओम प्रकाश राजभर अब बिहार की राजनीति में नई पारी खेलने की तैयारी में हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख राजभर ने ऐलान किया है कि वे बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के प्रत्याशी उतारेंगे और एनडीए गठबंधन को सीधी चुनौती देंगे। उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी अब “सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि विकल्प” के रूप में उभरेगी। इस घोषणा के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि राजभर का यह कदम एनडीए के लिए नए समीकरण पैदा कर सकता है।

राजभर का बिहार मिशन न केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा का संकेत है, बल्कि ओबीसी और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को साधने की रणनीति भी मानी जा रही है। बिहार में इन वर्गों की आबादी बड़ी है, और राजभर इस जनसमूह में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं। उन्होंने अपने हालिया भाषणों में कहा है कि “जो लोग गरीबों और पिछड़ों की आवाज़ दबाते हैं, उन्हें अब जवाब मिलेगा।” उन्होंने एनडीए सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सिर्फ बड़े जातिगत वर्गों की राजनीति करती है, जबकि छोटे और वंचित समुदायों को हाशिये पर रखा गया है। उनके इस बयान को विपक्षी दलों ने एक “नए मोर्चे की शुरुआत” के रूप में देखा है।

राजभर का दावा है कि वे बिहार के कई जिलों में संगठन खड़ा कर चुके हैं और जमीनी स्तर पर पार्टी तेजी से सक्रिय हो रही है। उन्होंने बताया कि पूर्वी बिहार और सीमांचल क्षेत्र में उनके समर्थकों ने सदस्यता अभियान चलाया है और स्थानीय मुद्दों को लेकर जनसभाएं भी शुरू की गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर राजभर अपनी जातिगत पकड़ को बिहार में दोहरा पाते हैं, तो यह एनडीए के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां ओबीसी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि बिहार की राजनीति में पैर जमाना आसान नहीं होगा। वहां पहले से ही एनडीए, महागठबंधन और कई छोटे क्षेत्रीय दल सक्रिय हैं। लेकिन ओम प्रकाश राजभर अपने बेबाक स्वभाव और आक्रामक रणनीति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कहा है कि “अब बिहार में भी गरीबों की आवाज़ गूंजेगी, और हमारी पार्टी उस गूंज की अगुवाई करेगी।” उनके इस रुख से साफ है कि आने वाले चुनावों में वे किसी भी बड़े गठबंधन की छत्रछाया में नहीं रहना चाहते, बल्कि खुद को एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने के मिशन पर हैं।

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