बीजेपी में टिकट पर बवाल! दतिया से हाईवे तक हंगामा, इस्तीफों की झड़ी और प्रशासन की कार्रवाई से गरमाई सियासत |
मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव ने मतदान से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के भीतर गहरे असंतोष की तस्वीर सामने ला दी है। पार्टी द्वारा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद शुरू हुआ विरोध अब संगठन और प्रशासन दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। बीजेपी ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया, जिसके बाद पार्टी के कई कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने खुलकर नाराजगी जताई। टिकट बदलने के फैसले के विरोध में समर्थक सड़कों पर उतर आए और विरोध प्रदर्शन ने जल्द ही बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया। इस घटनाक्रम ने विपक्ष को भी सरकार और बीजेपी की आंतरिक स्थिति पर सवाल उठाने का मौका दे दिया है।
टिकट की घोषणा के बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने दतिया में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगा दिया, जिससे कई घंटों तक यातायात बुरी तरह प्रभावित रहा। राजनीतिक विरोध का यह स्वरूप जल्द ही व्यापक प्रशासनिक चुनौती में बदल गया। इस बीच खबरें सामने आईं कि बीजेपी के जिला अध्यक्ष और पूरी जिला कार्यकारिणी ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, इन इस्तीफों को लेकर पार्टी की आधिकारिक प्रक्रिया और अंतिम निर्णय पर अलग-अलग जानकारियां सामने आ रही हैं। फिर भी यह घटनाक्रम स्पष्ट संकेत देता है कि टिकट वितरण को लेकर संगठन के भीतर असंतोष मौजूद है।
दतिया में हुए इस विरोध प्रदर्शन का असर केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। जिला प्रशासन के अनुसार हाईवे जाम होने से दतिया के अलावा झांसी, शिवपुरी और ग्वालियर की ओर जाने वाले मार्ग भी प्रभावित हुए। यातायात बाधित होने के कारण आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। प्रशासन का कहना है कि इस दौरान कई एंबुलेंस भी लंबे समय तक जाम में फंसी रहीं, जिससे आपातकालीन सेवाओं पर भी असर पड़ा। यही वजह रही कि प्रशासन ने प्रदर्शन को जल्द समाप्त कराने की कोशिश की।
दतिया के जिला कलेक्टर (डीएम) स्वप्निल वानखेड़े ने पूरे घटनाक्रम पर प्रशासन का पक्ष रखते हुए कहा कि अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों से कई बार बातचीत कर रास्ता खाली करने का अनुरोध किया था, लेकिन प्रदर्शनकारी नहीं माने। उनके अनुसार स्थिति उस समय और गंभीर हो गई जब कथित तौर पर पथराव शुरू हुआ। डीएम का कहना है कि इस घटना में पुलिस के आठ जवान घायल हुए और कई सरकारी तथा निजी वाहनों को नुकसान पहुंचा। प्रशासन के मुताबिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने पड़े।
प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लेकिन लाठीचार्ज नहीं किया गया। दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों और कुछ राजनीतिक नेताओं के दावे प्रशासन के बयान से अलग बताए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने जरूरत से ज्यादा सख्ती बरती। फिलहाल इन दावों और प्रतिदावों के बीच पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज होती जा रही है। किसी भी पक्ष के आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच और आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही हो सकेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले टिकट वितरण अक्सर दलों के भीतर असंतोष का कारण बनता है, लेकिन यदि यह असंतोष सार्वजनिक विरोध और संगठनात्मक इस्तीफों तक पहुंच जाए, तो उसका चुनावी असर भी देखने को मिल सकता है। दतिया का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नरोत्तम मिश्रा लंबे समय तक पार्टी के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और क्षेत्र में उनका राजनीतिक प्रभाव माना जाता है। ऐसे में समर्थकों की नाराजगी को शांत करना पार्टी नेतृत्व के लिए एक अहम चुनौती बन सकता है।
विपक्ष ने भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बीजेपी पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि यदि सत्तारूढ़ दल के भीतर ही उम्मीदवार चयन को लेकर इतना बड़ा विरोध है, तो यह संगठनात्मक असंतोष का संकेत है। वहीं बीजेपी की ओर से अभी तक यही कहा जा रहा है कि पार्टी संगठन सभी कार्यकर्ताओं से संवाद बनाए हुए है और चुनाव पूरी मजबूती के साथ लड़ा जाएगा। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व की रणनीति इस विवाद की दिशा तय कर सकती है।
फिलहाल दतिया उपचुनाव केवल चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बीजेपी की आंतरिक एकजुटता, संगठनात्मक अनुशासन और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या पार्टी नाराज कार्यकर्ताओं को साथ लाने में सफल होगी, या यह विवाद चुनाव प्रचार के दौरान भी जारी रहेगा। साथ ही, हाईवे जाम और उससे जुड़े घटनाक्रम की आगे की प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई भी इस पूरे मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
written by :- Anjali Mishra
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