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दुनिया का दंगल (International)

24 जुलाई का काउंटडाउन शुरू! भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर टिकी करोड़ों नौकरियां, क्या टलेगा 50% टैरिफ का खतरा?

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर समय तेजी से बीत रहा है, लेकिन अब तक किसी अंतिम सहमति की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। यदि 24 जुलाई तक दोनों देशों के बीच समझौता नहीं हो पाता, तो भारतीय निर्यात पर ऊंचे टैरिफ लागू होने की आशंका फिर चर्चा में आ गई है। ऐसी स्थिति में भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे कई निर्यात आधारित उद्योगों पर दबाव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। यही वजह है कि उद्योग जगत, निर्यातक और नीति-निर्माता इस समय वार्ता की प्रगति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं।

भारत और अमेरिका दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। हालांकि, बाजार पहुंच, आयात शुल्क, कृषि उत्पाद, डेयरी, डिजिटल व्यापार और कुछ औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर दोनों पक्षों के अलग-अलग हित रहे हैं। इन्हीं मुद्दों पर संतुलित समाधान तलाशने के लिए लंबे समय से बातचीत जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी व्यापार समझौते में दोनों देशों के आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होती है।

यदि व्यापारिक वार्ता तय समय तक सफल नहीं होती और अतिरिक्त टैरिफ लागू होते हैं, तो इसका असर भारत के कई प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर पड़ सकता है। टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, इंजीनियरिंग सामान, कृषि उत्पाद और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों को अमेरिकी बाजार में अधिक लागत का सामना करना पड़ सकता है। इससे निर्यात में कमी आने की आशंका व्यक्त की जा रही है, जिसका प्रभाव इन क्षेत्रों से जुड़े उद्योगों, छोटे कारोबारों और रोजगार पर भी पड़ सकता है।

भारत की ओर से लगातार यह रुख सामने आता रहा है कि किसी भी व्यापार समझौते में किसानों, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) तथा घरेलू विनिर्माण क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य ऐसा समझौता करना माना जाता है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिले और साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा भी बनी रहे। यही कारण है कि वार्ता के दौरान दोनों पक्ष कई जटिल मुद्दों पर विस्तृत बातचीत कर रहे हैं।

दूसरी ओर, अमेरिकी कंपनियां भारत में अधिक बाजार पहुंच और कुछ क्षेत्रों में शुल्क संबंधी रियायतों की अपेक्षा रखती रही हैं। वहीं भारत चाहता है कि उसके निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर अवसर मिलें और व्यापारिक बाधाएं कम हों। ऐसे में दोनों देशों के बीच बातचीत केवल शुल्क घटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक आर्थिक सहयोग और दीर्घकालिक व्यापारिक संबंधों से भी जुड़ी हुई है।

व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संतुलित समझौता होता है, तो इससे दोनों देशों को लाभ मिल सकता है। भारत के निर्यातकों को बड़ा बाजार मिलेगा, जबकि अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में व्यापार और निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं। लेकिन यदि वार्ता बिना किसी सहमति के समाप्त होती है, तो दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर अल्पकालिक दबाव बढ़ सकता है और उद्योग जगत को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल 24 जुलाई को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन अंतिम स्थिति दोनों देशों की आधिकारिक घोषणाओं और वार्ता के परिणाम पर ही निर्भर करेगी। जब तक कोई औपचारिक निर्णय सामने नहीं आता, तब तक टैरिफ, रियायतों और समझौते की शर्तों को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। उद्योग जगत भी यही उम्मीद कर रहा है कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ेगी।

अब 24 जुलाई केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं रह गई है, बल्कि भारत की आर्थिक रणनीति, व्यापारिक हितों और कूटनीतिक संतुलन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में देखी जा रही है। देश की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या भारत अपने किसानों, घरेलू उद्योगों और निर्यातकों के हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका के साथ एक संतुलित और दीर्घकालिक व्यापार समझौते तक पहुंच पाएगा, या फिर दोनों देशों के बीच मतभेद आगे भी बने रहेंगे। आने वाले दिन इस बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील की दिशा तय करेंगे।

written by :- Anjali MIshra

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