पीओके में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ बगावत तेज! 48 घंटे का अल्टीमेटम, 9 जुलाई को बड़े आंदोलन की चेतावनी |
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में राजनीतिक और जनआंदोलन का माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। क्षेत्र में लंबे समय से चल रहे असंतोष के बीच अब जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी ने पाकिस्तान सरकार के खिलाफ अपना रुख और कड़ा कर दिया है। कमेटी ने इस्लामाबाद को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि उनकी मांगों पर तय समय के भीतर सकारात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो 9 जुलाई को व्यापक और निर्णायक विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। इस घोषणा के बाद पीओके में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं और पूरे घटनाक्रम पर स्थानीय लोगों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की भी नजर बनी हुई है।
संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि उनका मौजूदा धरना-प्रदर्शन अनिश्चितकाल तक जारी रहेगा और तब तक समाप्त नहीं होगा, जब तक उनकी सभी प्रमुख मांगों पर सरकार ठोस निर्णय नहीं लेती। कमेटी का कहना है कि यह आंदोलन किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता की उन समस्याओं को लेकर चलाया जा रहा है जिनका समाधान लंबे समय से नहीं किया गया। संगठन का दावा है कि आम लोगों की आवाज को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, जिसके कारण लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
आंदोलन को और व्यापक बनाने के लिए कमेटी ने पीओके के विभिन्न जिलों के निवासियों के साथ-साथ दुनिया के अलग-अलग देशों में रहने वाले कश्मीरी प्रवासी समुदाय से भी समर्थन की अपील की है। संगठन ने सभी समर्थकों से 9 जुलाई को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग लेने का आह्वान किया है। कमेटी का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में लोग आंदोलन से जुड़ते हैं, तो उनकी मांगों को नजरअंदाज करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। इसी कारण संगठन लगातार जनसंपर्क अभियान भी चला रहा है।
पिछले कुछ समय से पीओके में महंगाई, बिजली संकट, टैक्स व्यवस्था, प्रशासनिक फैसलों और स्थानीय अधिकारों जैसे कई मुद्दों को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का आरोप रहा है कि आम जनता की समस्याओं का समाधान करने के बजाय प्रशासन आंदोलन को दबाने की कोशिश करता है। इन परिस्थितियों ने लोगों के भीतर असंतोष को और गहरा किया है, जिसके चलते अब विरोध प्रदर्शनों का दायरा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारी संगठन के बीच बातचीत का कोई रास्ता नहीं निकलता, तो 9 जुलाई का प्रस्तावित प्रदर्शन पीओके की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी होने की स्थिति में प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ सकती है। हालांकि यह पूरी तरह आने वाले दिनों की परिस्थितियों और सरकार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा कि स्थिति शांतिपूर्ण रहती है या तनाव और बढ़ता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान सरकार की ओर से आधिकारिक स्तर पर क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर भी सबकी नजर है। यदि सरकार आंदोलनकारियों की कुछ मांगों पर बातचीत शुरू करती है, तो तनाव कम होने की संभावना बन सकती है। वहीं यदि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम रहते हैं, तो विरोध प्रदर्शन और अधिक व्यापक रूप ले सकता है। फिलहाल आंदोलनकारी संगठन अपने घोषित कार्यक्रम के अनुसार धरना जारी रखने की बात कह रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पीओके में होने वाले घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है, क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय से संवेदनशील माना जाता है। किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन या राजनीतिक अस्थिरता का असर स्थानीय प्रशासन, सुरक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ सकता है। हालांकि अभी तक इस आंदोलन को लेकर विभिन्न पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, इसलिए घटनाओं की वास्तविक स्थिति का आकलन आधिकारिक सूचनाओं और स्वतंत्र रिपोर्टों के आधार पर ही किया जा सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी ने 48 घंटे की समय सीमा तय कर दी है और 9 जुलाई को बड़े विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या पाकिस्तान सरकार आंदोलनकारियों से बातचीत कर कोई समाधान निकालती है या फिर टकराव की स्थिति और गहरी होती है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन बनकर रह जाता है या पीओके की राजनीति और प्रशासन पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव देखने को मिलता है।
written by :- Anjali Mishra
( देश और दुनिया की खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं. )
