सोनिया गांधी PM क्यों नहीं बनीं? अब किताब खोलेगी वो राज, जिस पर सालों से उठते रहे सवाल!
सोनिया गांधी आखिर भारत की प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनीं? यह सवाल भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और अनसुलझे सवालों में से एक रहा है। 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनने के बाद सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चा बेहद तेज थी, लेकिन उन्होंने खुद इस पद को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। अब इतने वर्षों बाद सोनिया गांधी अपनी जिंदगी और राजनीतिक सफर से जुड़े कई ऐसे पहलुओं को किताब के जरिए सामने लाने वाली हैं, जिन पर लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में चर्चा होती रही है।
सोनिया गांधी की प्रस्तावित किताब इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि इसमें सिर्फ उनकी राजनीतिक यात्रा ही नहीं, बल्कि उनकी निजी जिंदगी के मुश्किल दौर और उन घटनाओं का भी जिक्र होने की बात सामने आई है, जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी। परिवार के करीबी लोगों को खोने का दर्द, भारत में उनके शुरुआती साल, राजनीति में आने का फैसला और कांग्रेस की कमान संभालने तक का सफर इन तमाम पहलुओं को वह अपनी नजर से सामने रख सकती हैं।
सबसे ज्यादा उत्सुकता उस हिस्से को लेकर है, जो प्रधानमंत्री पद को लेकर उनके फैसले से जुड़ा है। 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई और सहयोगी दलों के साथ यूपीए सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची। उस समय सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थीं और स्वाभाविक तौर पर प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम सबसे आगे माना जा रहा था। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने प्रधानमंत्री पद की दौड़ से खुद को अलग कर लिया।
इसके बाद डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया और सोनिया गांधी यूपीए की चेयरपर्सन के तौर पर सरकार के बाहर से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभाती रहीं। लेकिन सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद से पीछे हटने का फैसला आखिर क्यों किया इस सवाल पर वर्षों से अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं होती रही हैं। किसी ने इसे उनका व्यक्तिगत फैसला बताया, तो किसी ने राजनीतिक परिस्थितियों और विपक्ष के हमलों को इसके पीछे की वजह माना। अब अगर उनकी किताब में इस फैसले के पीछे की सोच विस्तार से सामने आती है, तो यह भारतीय राजनीति के उस दौर को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज हो सकता है।
सोनिया गांधी का राजनीतिक सफर भी अपने आप में असाधारण रहा है। राजीव गांधी की हत्या के बाद लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद उन्होंने कांग्रेस की कमान संभाली। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने कई चुनावों में महत्वपूर्ण प्रदर्शन किया और 2004 में यूपीए सरकार के गठन में उनकी भूमिका बेहद अहम रही। इसके बाद 2009 में भी कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए दोबारा सत्ता में आया। इस पूरे दौर में सोनिया गांधी भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल रहीं।
लेकिन उनकी जिंदगी सिर्फ सत्ता और राजनीति की कहानी नहीं है। इसमें व्यक्तिगत त्रासदियां भी शामिल हैं। पति राजीव गांधी की हत्या, सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या तथा परिवार के राजनीतिक इतिहास ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। किताब में अगर इन घटनाओं के व्यक्तिगत अनुभव और उनके मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर विस्तार से चर्चा होती है, तो पाठकों को सोनिया गांधी के सार्वजनिक जीवन के पीछे मौजूद निजी व्यक्ति को समझने का मौका मिल सकता है।
इस किताब को लेकर एक और दिलचस्प पहलू यह है कि सोनिया गांधी संभवतः उन सवालों पर भी अपनी बात रखेंगी, जिनका जवाब उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर हमेशा विस्तार से नहीं दिया। राजनीति में उनका प्रवेश क्यों हुआ? कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने का फैसला कैसे लिया? प्रधानमंत्री पद से पीछे हटने का निर्णय कितना व्यक्तिगत था और कितना राजनीतिक? उस समय उनके मन में क्या चल रहा था? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब को लेकर लंबे समय से अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं।
अगर किताब में इन सवालों पर सोनिया गांधी का प्रत्यक्ष दृष्टिकोण सामने आता है, तो यह कांग्रेस के इतिहास के साथ-साथ 2004 के भारतीय राजनीतिक घटनाक्रम को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर उन लोगों के लिए, जो जानना चाहते हैं कि सत्ता का सबसे बड़ा पद सामने होने के बावजूद एक नेता ने उसे स्वीकार करने से इनकार क्यों किया।
बताया जा रहा है कि यह किताब 10 नवंबर को प्रकाशित होने वाली है। इसके सामने आने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर आम पाठकों तक की नजर इस बात पर होगी कि सोनिया गांधी अपने जीवन के किन अनकहे पहलुओं को सार्वजनिक करती हैं। क्या प्रधानमंत्री पद से जुड़े सवाल का ऐसा जवाब मिलेगा, जो अब तक की तमाम अटकलों को खत्म कर दे? या फिर किताब कुछ नए सवाल भी खड़े करेगी?
फिलहाल इतना तय है कि सोनिया गांधी की जिंदगी के वे पन्ने, जिन पर वर्षों से राजनीति और मीडिया में चर्चा होती रही है, अब उनकी अपनी आवाज में सामने आने वाले हैं। सत्ता, संघर्ष, परिवार, दुख और राजनीति इन सबके बीच प्रधानमंत्री पद को ठुकराने का फैसला उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे रहस्यमय अध्याय रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या 10 नवंबर को आने वाली किताब बताएगी कि सोनिया गांधी ने 2004 में प्रधानमंत्री बनने से आखिर क्यों इनकार किया था? अगर इस सवाल का जवाब किताब में साफ शब्दों में मिलता है, तो यह सिर्फ सोनिया गांधी की आत्मकथा का हिस्सा नहीं होगा, बल्कि भारतीय राजनीति के एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ के पीछे की कहानी भी सामने आ सकती है।
written by:- Anjali Mishra
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