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दुनिया का दंगल (International)

होर्मुज पर ट्रंप का“New U.S. Territory” वाले नक्शे से मिडिल ईस्ट में फिर मचा घमासान !

होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने मिडिल ईस्ट की राजनीति में फिर हलचल बढ़ा दी है। ट्रंप ने एक नक्शा शेयर किया, जिसमें Strait of Hormuz को “New U.S. Territory” यानी “नया अमेरिकी क्षेत्र” के तौर पर दिखाया गया। हालांकि सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यह नक्शा अपने आप में किसी औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा परिवर्तन या कानूनी रूप से मान्य अमेरिकी कब्जे की घोषणा नहीं है। यह ट्रंप की ओर से किया गया राजनीतिक दावा और संदेश है। ट्रंप इससे पहले भी होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण की बात कर चुके हैं।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर होर्मुज को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों है? इसकी वजह है इसकी रणनीतिक अहमियत। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा पहले इसी मार्ग से होकर गुजरता रहा है। मौजूदा संकट में यहां जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ गया है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक होर्मुज से सामान्य समुद्री आवाजाही को लेकर अभी भी भारी अनिश्चितता बनी हुई है।

यही वजह है कि ट्रंप का “New U.S. Territory” वाला नक्शा सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं माना जा रहा। इसके पीछे अमेरिका की उस रणनीति का संकेत देखा जा रहा है, जिसमें वॉशिंगटन होर्मुज के रास्ते पर अपना प्रभाव और नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिकी नौसैनिक कार्रवाई के कारण रास्ता खुला और संचालित है, जबकि ईरान का कहना है कि स्थिति बिल्कुल अलग है और जलडमरूमध्य को लेकर उसकी अपनी शर्तें हैं। यानी एक ही समुद्री रास्ते की स्थिति को लेकर दोनों देशों के दावे एक-दूसरे के बिल्कुल उलट हैं।

ईरान ने ट्रंप के इस दावे को स्वीकार नहीं किया है। बल्कि अमेरिकी नक्शे के जवाब में ईरान की ओर से भी एक प्रतीकात्मक पलटवार देखने को मिला, जिसमें कैलिफोर्निया को “New Territory of Islamic Republic of Iran” के तौर पर दिखाया गया। यानी तेहरान ने सीधे तौर पर संकेत दिया कि वह ट्रंप के क्षेत्रीय दावे को गंभीरता से चुनौती दे रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका और ईरान के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।

और अब कहानी का सबसे अहम हिस्सा है बातचीत का संकट। ट्रंप ने 18 अगस्त को कहा कि ईरान के साथ फिलहाल कोई बातचीत या बातचीत की तय तारीख नहीं है। वहीं ईरान की ओर से कहा जा रहा है कि होर्मुज से जुड़ी स्थिति तब तक सामान्य नहीं होगी, जब तक उसकी प्रमुख शर्तों पर समाधान नहीं निकलता। यानी एक तरफ अमेरिका दबाव बनाए हुए है, तो दूसरी तरफ ईरान होर्मुज को अपनी रणनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।

इस पूरे विवाद का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है। भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था इस घटनाक्रम पर नजर रख रही है, क्योंकि होर्मुज में लंबे समय तक व्यवधान का सीधा असर कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर पड़ सकता है। 19 अगस्त को रिपोर्टों के अनुसार ब्रेंट क्रूड करीब 91.79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि बाजार में आगे भी कीमतों के बढ़ने को लेकर चिंता बनी हुई है।

भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। अगर होर्मुज के रास्ते तेल की सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं, बल्कि परिवहन लागत, महंगाई और उद्योगों की लागत पर भी पड़ सकता है। यानी मिडिल ईस्ट में चल रही यह भू-राजनीतिक लड़ाई हजारों किलोमीटर दूर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब तक असर डाल सकती है।

सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या ट्रंप सच में होर्मुज को अमेरिकी क्षेत्र बनाने की दिशा में कोई औपचारिक कदम उठाएंगे, या यह सिर्फ दबाव बनाने वाली राजनीतिक भाषा है? अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और संप्रभुता के लिहाज से ऐसा कदम बेहद गंभीर और विवादास्पद होगा। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों में ट्रंप का नक्शा एक राजनीतिक संदेश के रूप में सामने आया है, न कि किसी मान्य अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय बदलाव के रूप में। इसलिए इस दावे को अमेरिकी क्षेत्र के वास्तविक विस्तार के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

लेकिन इतना जरूर है कि होर्मुज अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रहा यह अमेरिका और ईरान के बीच शक्ति प्रदर्शन का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। एक तरफ ट्रंप अमेरिकी नियंत्रण की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ ईरान अपने अधिकार और शर्तों पर अड़ा हुआ है, और इनके बीच दुनिया की ऊर्जा सप्लाई फंसी हुई है। ऊपर से बातचीत का रास्ता भी फिलहाल बंद दिखाई दे रहा है।

तो असली सवाल नक्शे से भी बड़ा है क्या होर्मुज पर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव आगे और बढ़ेगा, या दोनों देश किसी ऐसे समझौते पर पहुंचेंगे जिससे दुनिया का यह अहम तेल मार्ग फिर सामान्य हो सके? क्योंकि अगर होर्मुज की स्थिति लंबे समय तक नहीं सुधरी, तो इसका अगला असर सिर्फ मिडिल ईस्ट में नहीं, बल्कि दुनिया के तेल बाजार और आम लोगों की जेब पर दिखाई दे सकता है।

written by:- Anjali Mishra

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