अमेरिका जैसी हाईवे टेक्नोलॉजी का दावा… 4,200 करोड़ का एक्सप्रेसवे और कुछ ही दिनों में सड़क पर सवाल!
अमेरिका की स्पेस टेक्नोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीक से हाईवे बनाने के दावे, करीब 4,200 करोड़ रुपये की लागत, बड़े स्तर का उद्घाटन और फिर महज कुछ ही दिनों बाद सड़क की सतह पर स्लिपेज और धंसने की शिकायतें… लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे अब सिर्फ एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि निर्माण गुणवत्ता और निगरानी को लेकर बड़ा सवाल बन गया है। 13 जुलाई 2026 को उद्घाटन के बाद 26 जुलाई को उन्नाव के पास सड़क की ऊपरी सतह में समस्या सामने आई। शुरुआत में NHAI ने इसे पूरी सड़क के धंसने के बजाय करीब 40 मीटर हिस्से की surface slippage बताया था।
63 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे को लखनऊ और कानपुर के बीच सफर का समय कम करने वाली बड़ी परियोजना के तौर पर पेश किया गया था। लेकिन उद्घाटन के बाद बारिश के दौरान कई जगहों पर सड़क की सतह में खराबी, कटाव और बैठने जैसी समस्याओं की खबरें सामने आने लगीं। अगस्त की शुरुआत तक कई स्थानों पर स्लिपेज और सेटलमेंट की शिकायतें सामने आने के बाद NHAI ने टोल वसूली को अस्थायी रूप से रोक दिया और प्रभावित हिस्सों की मरम्मत शुरू कराई।
मामला बढ़ा तो सवाल सिर्फ सड़क की ऊपरी परत तक सीमित नहीं रहा। आखिर नई सड़क के निर्माण के तुरंत बाद ऐसी समस्या क्यों आई? क्या भारी बारिश और नमी इसकी वजह है? क्या सड़क के नीचे की परतों में पानी पहुंचा? क्या मिट्टी की गुणवत्ता और कम्पैक्शन पर्याप्त था? या फिर ड्रेनेज व्यवस्था में कोई कमी रह गई? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए IIT खड़गपुर की विशेषज्ञ टीम को तकनीकी जांच के लिए लगाया गया। टीम ने एक्सप्रेसवे के प्रभावित हिस्सों का निरीक्षण किया और मिट्टी, बिटुमिन तथा सड़क की अलग-अलग परतों से नमूने भी लिए।
जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सड़क के नीचे मौजूद बेस और मिट्टी की स्थिति है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर सड़क के नीचे की मिट्टी पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं है या निर्धारित मानकों के अनुसार उसका कम्पैक्शन नहीं हुआ है, तो बारिश का पानी अंदर पहुंचने के बाद समस्या बढ़ सकती है। सड़क निर्माण में मिट्टी को नियंत्रित मोटाई की परतों में डालकर उचित नमी और घनत्व के साथ कम्पैक्ट करना बेहद जरूरी होता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस प्रक्रिया की निगरानी और गुणवत्ता जांच किस स्तर पर हुई थी।
ड्रेनेज भी इस पूरी कहानी का बेहद अहम हिस्सा बनकर सामने आया है। सड़क के नीचे या आसपास पानी जमा होने से बेस और सबग्रेड की मजबूती प्रभावित हो सकती है। कुछ रिपोर्टों में प्रभावित स्थानों पर सड़क के नीचे नमी मिलने और ड्रेनेज की कार्यक्षमता पर सवाल उठने की बात सामने आई है। वहीं दूसरी ओर NHAI से जुड़े अधिकारियों ने शुरुआती जांच में सड़क की ऊपरी सामग्री के परीक्षण को संतोषजनक बताया था। यानी अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरी समस्या किसी एक कारण से हुई है। अंतिम तकनीकी निष्कर्ष ही इसकी वास्तविक वजह स्पष्ट करेंगे।
इस मामले में NHAI ने कार्रवाई भी शुरू कर दी है। निर्माण एजेंसी PNC Infratech के खिलाफ कार्रवाई की गई है और उसे नॉन-परफॉर्मर घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की गई। संबंधित अधिकारियों और इंजीनियरों पर भी कार्रवाई की गई है। NHAI के मुताबिक प्रभावित हिस्से की मरम्मत का खर्च निर्माण एजेंसी से वसूला जाएगा और समस्या पूरी तरह ठीक होने तक यात्रियों से टोल नहीं लिया जाएगा।
लेकिन अब असली सवाल मरम्मत का नहीं, जवाबदेही का है। अगर सड़क में वास्तव में निर्माण या डिजाइन से जुड़ी कमी पाई जाती है तो जिम्मेदारी किसकी होगी? निर्माण एजेंसी की, स्वतंत्र इंजीनियर की, गुणवत्ता नियंत्रण टीम की या उस सरकारी तंत्र की जिसने परियोजना की निगरानी और निरीक्षण किया? करोड़ों रुपये की परियोजना में गुणवत्ता की कई स्तरों पर जांच होती है, इसलिए किसी समस्या के सामने आने पर यह जानना भी जरूरी है कि वह कमी पहले की जांच में क्यों नहीं पकड़ी गई।
एक और दिलचस्प सवाल इस एक्सप्रेसवे के निर्माण और उद्घाटन के बीच के अंतर को लेकर भी सामने आया है। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक सड़क का काम जून 2025 तक पूरा हो गया था, लेकिन एक्सप्रेसवे का उद्घाटन जुलाई 2026 में हुआ। यानी परियोजना का एक हिस्सा लगभग एक साल तक ट्रैफिक के लिए इस्तेमाल नहीं हुआ। कुछ अधिकारियों ने यह संभावना भी जांच के दायरे में बताई कि लंबे समय तक इस्तेमाल न होने और फिर मानसून के दौरान खोलने का सड़क की बिटुमिनस परत पर असर पड़ा हो सकता है।
हालांकि इस पूरे विवाद में एक बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है IIT खड़गपुर की जांच को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग दावे सामने आ रहे हैं, जबकि NHAI ने कुछ शुरुआती आरोपों में स्ट्रक्चरल खामी से इनकार भी किया है। इसलिए जब तक आधिकारिक और अंतिम तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से स्पष्ट निष्कर्ष नहीं देती, तब तक ड्रेनेज, मिट्टी की पटाई, सामग्री की गुणवत्ता या किसी खास तकनीकी खामी को अंतिम कारण मानना उचित नहीं होगा।
लेकिन जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है अगर 4,200 करोड़ रुपये की परियोजना है, तो उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? सड़क की मरम्मत हो जाएगी, गड्ढे भर दिए जाएंगे, नई परत बिछा दी जाएगी और एक्सप्रेसवे फिर से चमकने लगेगा। लेकिन अगर मूल समस्या निर्माण प्रक्रिया या निगरानी में थी, तो सिर्फ पैचवर्क से मामला खत्म नहीं होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि तकनीकी जांच के निष्कर्ष सामने आएं और जहां भी वास्तविक लापरवाही साबित हो, वहां जिम्मेदारी भी तय हो।
क्योंकि मामला सिर्फ एक सड़क के कुछ हिस्सों के खराब होने का नहीं है। मामला जनता के हजारों करोड़ रुपये, इंफ्रास्ट्रक्चर की विश्वसनीयता और सरकारी गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था पर भरोसे का है। हाईवे जितना बड़ा हो, उसकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। अब देखना होगा कि IIT की तकनीकी जांच और NHAI की कार्रवाई के बाद यह पूरा मामला सिर्फ मरम्मत तक सीमित रहता है या फिर उन लोगों की भी जिम्मेदारी तय होती है, जिन्होंने इस परियोजना को गुणवत्ता की कसौटी पर पास किया था।
क्योंकि सड़क का गड्ढा तो मशीनें भर देंगी… लेकिन अगर सिस्टम में गड्ढा है, तो उसे कौन भरेगा?
written by:- Anjali Mishra
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