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मऊ की सियासत में मतदाता सूची बना ‘बारूद’, किसकी बात सच?

मऊ में वोटर लिस्ट को लेकर अचानक ऐसा घमासान शुरू हुआ है, जिसने जिले की राजनीति का तापमान कई डिग्री बढ़ा दिया है। घोसी के सांसद राजीव राय ने दावा किया है कि मऊ सदर विधानसभा में करीब 20 हजार वोट काटे गए हैं, और यह कोई सामान्य गलती नहीं बल्कि एक “सुनियोजित गड़बड़ी” लग रही है। उनका कहना है कि उन्होंने सभी दस्तावेज़ और तथ्यात्मक सबूतों के साथ चुनाव आयोग को पत्र भी भेजा, मिलने का समय भी मांगा, लेकिन न जवाब मिला और न ही मुलाकात का मौका। यही वजह है कि उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इस मामले की लड़ाई वो “सड़क से लेकर सदन तक” लड़ेंगे।

दूसरी तरफ प्रशासन इस आरोप को सिरे से खारिज कर रहा है। मऊ के DM का स्पष्ट बयान है कि शिकायत तथ्यहीन है और SIR यानी Special Increment Revision की प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता के साथ चल रही है। DM यह भी स्वीकार करते हैं कि सितंबर में एक विशेष अभियान के दौरान मतदाता सूची में कुछ नाम हटाए और जोड़े गए थे, लेकिन मौजूदा SIR प्रक्रिया में किसी भी मतदाता का नाम नहीं काटा गया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ नियमित संशोधन की प्रक्रिया है, जिसे हर विधानसभा क्षेत्र में किया जाता है।

DM के जवाब के बाद सवाल यह उठता है कि अगर सितंबर वाले अभियान में संशोधन हुआ था तो क्या वही आंकड़ा अब राजनीतिक मुद्दा बन रहा है? राजीव राय का दावा है कि उनकी टीम के पास ठोस प्रमाण हैं कि बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं, जबकि प्रशासन का दावा है कि BLO अपने-अपने क्षेत्र में काम पूरा कर चुके हैं और विशेष संशोधित मतदाता सूची सभी राजनीतिक दलों को उपलब्ध करा दी गई है। ऐसे में दोनों पक्षों के बयान एक-दूसरे से बिल्कुल उलट नज़र आते हैं।

मौजूदा हालात में इस विवाद का एक बड़ा पहलू यह भी है कि मऊ की राजनीति हमेशा से संवेदनशील मानी जाती है। यहां मतदाता सूची में एक छोटा बदलाव भी चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। यही वजह है कि विपक्ष का आरोप है कि सत्ता पक्ष लाभ लेने के लिए मतदाता आधार को प्रभावित कर रहा है, जबकि प्रशासन अपनी प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बता रहा है। इस टकराव के बीच जनता असमंजस में है कि आखिर किसकी बात पर भरोसा किया जाए।

हालांकि चुनाव आयोग पर भी सवाल उठ रहे हैं कि सांसद के पत्र का जवाब समय पर क्यों नहीं दिया गया। लोकतंत्र में आयोग की निष्पक्षता सबसे अहम होती है, और ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर समय पर संवाद न होना विवाद को और गहरा कर देता है। अगर राजीव राय के पास वाकई सबूत हैं, तो आयोग को उन्हें सुनना चाहिए था, ताकि मामले की सच्चाई सामने आ सके।

आखिरकार सबसे बड़ा सवाल यही है क्या सचमुच वोट कटे हैं या फिर आने वाले चुनावों से पहले यह सिर्फ राजनीतिक गर्माहट है? दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलों पर अड़े हुए हैं, और जनता इन बयानों के बीच फंसी है। जब तक चुनाव आयोग इस मामले पर स्पष्ट जांच रिपोर्ट नहीं देता, तब तक मऊ का यह विवाद आने वाले दिनों में और ज्यादा राजनीतिक तूफान खड़ा करेगा।

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