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जन्माष्टमी में लखनऊ का रंग !

लखनऊ की गलियों में जन्माष्टमी का जश्न अपने पूरे शबाब पर है। जैसे ही त्योहार का दिन आता है, शहर की रौनक और बढ़ जाती है। नुक्कड़ों पर रंग-बिरंगी पिचकारियाँ, चमचमाती छोटी-छोटी मटकियाँ, मोरपंख, बांसुरी और कान्हा की प्यारी-प्यारी पोशाकें दुकानों पर सजी दिखाई देती हैं। सुबह से ही बाज़ार में भीड़ उमड़ पड़ती है—माँ-बाप अपने बच्चों के लिए तैयारियाँ करते नज़र आते हैं, और दुकानदार भी ग्राहकों का स्वागत बड़ी खुशी से करते हैं।

मोहल्लों में बच्चों का उत्साह देखने लायक होता है। कोई मोरपंख को अपने मुकुट में सजाने में व्यस्त है, तो कोई बांसुरी को पॉलिश कर रहा है ताकि वह कान्हा के रूप में सबसे अलग और सबसे सुंदर लगे। घर-घर में बच्चों को तैयार करने का सिलसिला चलता है—किसी के माथे पर चंदन का तिलक लगाया जा रहा है, तो किसी के गले में मोती की माला डाली जा रही है। यह सिर्फ सजने-संवरने का मौका नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की झलक को जीवंत करने का एक माध्यम है।

जन्माष्टमी पर मोहल्ले के बच्चे पिरामिड बनाने की तैयारी में जुट जाते हैं। डोल-नगाड़ों की थाप के बीच, जैसे ही कोई टीम पिरामिड बनाना शुरू करती है, नीचे से भीड़ “गोविंदा आला रे” के जयकारे लगाने लगती है। ऊंचाई पर रखी मटकी को फोड़ने के लिए नन्हे-नन्हे ‘गोविंदा’ अपने साहस और संतुलन का कमाल दिखाते हैं। जब मटकी फूटती है और दही, मक्खन व फूलों की बारिश होती है, तो पूरा माहौल उल्लास और हंसी-खुशी से भर जाता है।

लखनऊ की सबसे बड़ी खासियत उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब है, और जन्माष्टमी इसका सबसे सुंदर उदाहरण बन जाती है। इस शहर में धर्म से ऊपर उठकर लोग एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होते हैं। जन्माष्टमी पर सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम परिवारों के बच्चे भी मन से कान्हा बनते हैं, मुकुट पहनते हैं और पिरामिड बनाने में हिस्सा लेते हैं। इस आपसी भाईचारे का नज़ारा त्योहार की असली मिठास को और बढ़ा देता है।

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मोहल्लों में आयोजन समितियां बच्चों के लिए छोटे-छोटे पुरस्कार और मिठाइयों की व्यवस्था करती हैं। शाम को मंदिरों में झूलों पर विराजमान लड्डू गोपाल का दर्शन करने के लिए भीड़ उमड़ती है। भजन-कीर्तन, नाटक और रासलीला का आयोजन भी होता है, जिसमें स्थानीय कलाकार और बच्चे बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। इस तरह यह त्योहार सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मेल-मिलाप और सामुदायिक एकता का पर्व बन जाता है।

जन्माष्टमी के इन रंग-बिरंगे दृश्यों से पूरा लखनऊ जैसे एक बड़े परिवार की तरह नजर आता है। हर गली, हर नुक्कड़ पर हंसी, संगीत और भाईचारे की महक फैल जाती है। जब एक साथ कान्हा बने बच्चे, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, पिरामिड बनाते हैं और हंसते-खेलते त्योहार का आनंद लेते हैं, तो यह संदेश साफ होता है—हम अलग-अलग पहचान के बावजूद, एक ही डोर में बंधे हैं। यही है लखनऊ की पहचान, और यही जन्माष्टमी का असली संदेश।

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