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UP लिफ्ट एक्ट 2024 बेअसर !

उत्तर प्रदेश लिफ्ट एवं एस्केलेटर अधिनियम-2024” लागू हुए महीनों बीत चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि इसका असर नगण्य रहा है। प्रदेशभर में लिफ्ट दुर्घटनाओं की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं — कहीं लिफ्ट गिर जाती है, कहीं लोग फंस जाते हैं, तो कहीं तकनीकी खामियां जानलेवा बन जाती हैं।

प्रश्न यही है: जब कानून बन चुका है, तो उसका पालन क्यों नहीं हो रहा?

बिल्डरों और निजी कंपनियों पर नज़र डालें, तो साफ दिखता है कि वे या तो इस कानून को गंभीरता से नहीं ले रहे, या फिर कानून की खामियों का खुलकर फायदा उठा रहे हैं। न तो समय पर मेंटेनेंस हो रहा है, और न ही सुरक्षा मानकों का अनुपालन। परिणामस्वरूप, आम नागरिकों की जान जोखिम में पड़ रही है।

सरकार को क्या करना चाहिए?

सरकार को महज कानून बना देने से आगे जाकर —
सख्त निगरानी तंत्र लागू करना होगा

नियमित ऑडिट और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम पर ध्यान देना होगा
साथ ही लिफ्ट बीमा योजना और जुर्माने की कठोर व्यवस्था करनी होगी

अन्यथा, यह अधिनियम सिर्फ कागज़ों में रहेगा — एक ऐसा कानून जिसके “दांत” नहीं हैं।

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कुछ हालिया लिफ्ट हादसे, जो सिस्टम की पोल खोलते हैं:

नोएडा (10 जून 2025) – ग्रेटर नोएडा पी-4 की एक सीनियर सिटिजन सोसाइटी में छह लोग पौने घंटे तक लिफ्ट में फंसे रहे।

गाजियाबाद (28 मई 2025) – 9 साल का बच्चा चलते लिफ्ट में फंस गया। उसे 4 मिनट बाद निकाला गया, पर यह एक बड़ा अलार्म था।

नोएडा (26 मई 2025) – एक अस्पताल की लिफ्ट में 16 लोग आधे घंटे तक फंसे रहे। घटना ने अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही उजागर की।

गाजियाबाद (5 अप्रैल 2025) – 26वीं मंज़िल से लिफ्ट गिर गई, 6 बच्चे सवार थे। सौभाग्य से जानें बचीं, लेकिन डर गहरा था।

लखनऊ (11 जनवरी 2025) – 15 वर्षीय शरद का पैर लिफ्ट में फंस गया, दमकल कर्मियों ने निकाला लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

अलीगढ़ (16 दिसंबर 2024) – केके अस्पताल की लिफ्ट में एक परिवार घंटे भर से ज्यादा फंसा रहा, एक महिला बेहोश हो गई।

मेरठ (13 दिसंबर 2024) – कचहरी परिसर में विधायक रफीक अंसारी समेत 10 लोग लिफ्ट में फंसे। भारी अफरा-तफरी मच गई।

वाराणसी (8 दिसंबर 2024) – एक लिफ्ट पांचवीं मंज़िल से गिर गई, जिसमें पीसीएस अधिकारी की पत्नी और घरेलू सहायिका घायल हो गईं।

“उत्तर प्रदेश लिफ्ट एवं एस्केलेटर अधिनियम-2024” एक ज़रूरी और सराहनीय पहल है, लेकिन इसका क्रियान्वयन और निगरानी बेहद कमजोर है। जब तक प्रशासन और सिस्टम की जवाबदेही तय नहीं की जाती, ऐसे हादसे जारी रहेंगे। अब समय है कि इस कानून को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए सरकार कड़े फैसले ले — ताकि यह अधिनियम सिर्फ एक औपचारिकता बनकर न रह जाए।

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