नेपाल की तबाही पर ट्रंप चिंतित, उत्तराखंड में 13 ग्लेशियल झीलों पर बढ़ी निगरानी !
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन के बाद अब इसका असर पड़ोसी देशों की चिंता में भी दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेपाल की भयावह स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा है कि अमेरिका ने नेपाल के नेतृत्व से संपर्क कर हर जरूरी मदद देने की पेशकश की है। उन्होंने तबाही की भयावहता बताते हुए कहा कि मजबूत इमारतें भी ऐसे ढह गईं, जैसे वे टूथपिक हों।
ट्रंप ने नेपाल में मौजूद अमेरिकी नागरिकों को लेकर भी चिंता जाहिर की। उनके शुरुआती बयान के मुताबिक वहां मौजूद करीब 50 से 60 अमेरिकी नागरिकों की स्थिति की पूरी जानकारी उस समय उपलब्ध नहीं थी। हालांकि, बाद की रिपोर्टों में लापता अमेरिकी नागरिकों की संख्या करीब 90 तक बताई गई है। इससे साफ है कि राहत और बचाव अभियान के बीच विदेशी नागरिकों की तलाश भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
नेपाल में हालात इसलिए और गंभीर हैं क्योंकि आपदा के बाद भी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के ऊपर बने दो झीलनुमा जलाशयों की निगरानी की जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक इनमें से एक झील से पानी निकलना शुरू हुआ है, जबकि दूसरी झील में अभी भी पानी बढ़ने की चिंता बनी हुई है। अगर ऐसी झीलों में अचानक दबाव बढ़ता है या प्राकृतिक बांध टूटता है, तो नीचे के इलाकों में दोबारा तेज बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।
नेपाल की इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों के खतरे को लेकर भारत की चिंता भी बढ़ा दी है। इसी के बाद उत्तराखंड सरकार ने राज्य की 13 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी मजबूत करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इन झीलों का वैज्ञानिक आकलन और नियमित निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं, ताकि किसी भी संभावित खतरे का पता समय रहते लगाया जा सके।
सरकार अब इन संवेदनशील झीलों की चरणबद्ध तरीके से जांच कराने और आधुनिक सेंसर आधारित निगरानी व्यवस्था विकसित करने की तैयारी कर रही है। इसके साथ अर्ली वार्निंग सिस्टम मजबूत करने की योजना है। इसका उद्देश्य यह है कि अगर किसी ग्लेशियल झील के जलस्तर, दबाव या आसपास की भौगोलिक स्थिति में अचानक बदलाव आता है, तो उसकी जानकारी समय रहते प्रशासन और स्थानीय लोगों तक पहुंच सके।
ग्लेशियल झीलों का खतरा इसलिए गंभीर माना जाता है क्योंकि ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों में बर्फ और मलबे से बने प्राकृतिक बांध कभी-कभी अस्थिर हो सकते हैं। ऐसे बांध टूटने या झील का पानी अचानक बाहर निकलने पर Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF जैसी स्थिति बन सकती है। तेज बहाव अपने साथ पानी के अलावा बर्फ, चट्टान और मलबा भी नीचे ला सकता है, जिससे कुछ ही समय में बड़े इलाके में भारी नुकसान हो सकता है। नेपाल की मौजूदा आपदा ने इसी तरह के जोखिमों पर फिर से ध्यान खींचा है।
उत्तराखंड के लिए यह चेतावनी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य का बड़ा हिस्सा हिमालयी क्षेत्र में आता है और कई ग्लेशियल झीलें ऊंचाई वाले संवेदनशील इलाकों में मौजूद हैं। सरकार का फोकस अब केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने पर नहीं, बल्कि पहले खतरे की पहचान और फिर समय रहते लोगों को अलर्ट करने पर है। वैज्ञानिक सर्वे, सेंसर, निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
कुल मिलाकर, नेपाल की भयावह आपदा ने पूरी दुनिया को हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों की गंभीर चेतावनी दी है। अमेरिका ने नेपाल को हरसंभव मदद का भरोसा दिया है, वहीं उत्तराखंड ने अपनी 13 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी बढ़ाने का फैसला किया है। अब चुनौती सिर्फ राहत और बचाव तक सीमित नहीं है असल लक्ष्य यह है कि अगली बार खतरा आने से पहले उसका संकेत मिल जाए और लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का पर्याप्त समय मिल सके।
written by:- Anjali Mishra
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