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नवाबों के शहर की जंग-ए-ट्रैफिक, जीतने वाले जाम, हारती जनता!

वाह! क्या बात है लखनऊ! जिसे हम नवाबों के शहर, तहज़ीब के मरकज़ और अदब की राजधानी के तौर पर जानते थे, आज आपने उसे जाम-ए-जन्नत में बदल दिया है। दिन की शुरुआत हो या शाम का समापन, आपकी सड़कों पर दौड़ती नहीं, बल्कि रेंगती गाड़ियां इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि आपने ट्रैफिक को भी एक कला का रूप दे दिया है।

​आज, पुराने लखनऊ के हृदय-स्थलों, पांडे गंज, याहियागंज, नक्खास, ट्रॉमा सेंटर और सिटी स्टेशन, ने साबित कर दिया कि यहाँ का जाम किसी अंतर्राष्ट्रीय युद्ध से कम नहीं है। सुना है दीपावली से पहले पुलिस अधिकारियों ने व्यवस्था का जायजा लिया था और बड़े-बड़े दावे भी किए थे। लेकिन आज के जाम ने उन सभी दावों को ऐसे ध्वस्त किया है, जैसे कोई अनाड़ी बच्चा रेत का महल गिरा दे। मानना पड़ेगा, पुलिस और प्रशासन के दावे सिर्फ कागज़ों पर ही पास होते हैं, सड़क पर तो उन्हें सरेआम फेल होना ही होता है!

​असल खेल तो उन कलाकारों का है, जिन्होंने सरकारी ज़मीन को अपना निजी शौक बना लिया है। याहियागंज से नादान महल तक की रोड पर दुकानदारों ने सड़क को अपनी प्राइवेट पार्किंग और डिस्प्ले एरिया घोषित कर रखा है। पांडे गंज के दुकानदार और उनके अवैध कब्ज़े, और सड़क पर जहाँ मन करे, वहाँ खड़े कर दिए गए वाहन, ये सब मिलकर लखनऊ की अतिक्रमण संस्कृति को एक नया आयाम देते हैं।

​वाह, नगर निगम, लखनऊ विकास प्राधिकरण और जिलाधिकारी साहब के कार्यालय! आप धन्य हैं। आपके दफ्तरों में शिकायतों का अंबार लगा है, हाईकोर्ट ने भी सरकारी ज़मीन मुक्त करो का फरमान सुनाया है, लेकिन आपकी गहन निद्रा तोड़ने की हिम्मत किसमें है? ऐसा लगता है, आपने कसम खा ली है कि जब तक जाम जनता का जीना हराम नहीं कर देता, तब तक आप जस की तस वाली मुद्रा में ही रहेंगे।

​चारबाग से लेकर ट्रॉमा सेंटर तक के मुख्य मार्ग पर जो अवैध कब्ज़ों का साम्राज्य फैला है, वह सचमुच शर्मसार करने वाला है, मगर किसे? उन जनता को, जो रोज़ उसमें फंसकर झूलती है। क्योंकि हमारे दूरदर्शी अधिकारियों को ये सब दिखता ही नहीं! या शायद वो देखना ही नहीं चाहते, क्योंकि इस जाम-तंत्र में न केवल जनता पीसती है, बल्कि कई व्यवस्थाएँ चुपचाप फलती-फूलती भी हैं।

​तो मेरे प्यारे लखनऊवासियों, अपनी इस करंट जाम की त्रासदी पर आंसू मत बहाइए। सिर गर्व से ऊँचा कीजिए! आप उस शहर के नागरिक हैं, जहाँ समय का कोई मोल नहीं है। यहाँ घंटों जाम में फंसना एक ऐतिहासिक अनुभव है, जिसे हमारे अधिकारी बड़ी मेहनत और लगन से बनाए रखते हैं।

​पुनश्च: अगली बार जब कोई अधिकारी ट्रैफिक सुधारने का दावा करे, तो बस एक बार पांडे गंज और नक्खास का दर्शन करा दीजिए। शायद उनके दावों की हवा अपने आप निकल जाए! तब तक, जाम में झूलते रहिए और ‘मुस्कुराते’ रहिए! क्योंकि अब लखनऊ यही है!

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