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याचिकाकर्ता को धमकाना पड़ा महंगा !

जौनपुर के बड़ागांव निवासी गौरी शंकर सरोज को जनहित याचिका दायर करना उस वक्त महंगा पड़ गया, जब स्थानीय प्रशासन और पुलिसकर्मियों ने इस कदम को दबाने की कोशिश की। गौरी शंकर द्वारा मुंगराबादशाहपुर क्षेत्र में सरकारी कार्यप्रणाली से जुड़ी गड़बड़ियों को लेकर याचिका दाखिल की गई थी। लेकिन इस कानूनी पहल के जवाब में, उन्हें कथित रूप से लेखपाल और पुलिसकर्मियों द्वारा धमकाया गया, जबरन वाहन में बैठाकर थाने ले जाया गया और ₹2000 लेकर छोड़ने का आरोप सामने आया।

मामला तब तूल पकड़ गया जब यह बात इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंची। कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया और संबंधित अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी। इसके बाद एसपी डॉ. कौस्तुभ ने स्वयं इस प्रकरण की जांच की और चौकाने वाली सच्चाई सामने आई। रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि वादी को उत्पीड़न का शिकार बनाया गया था, और उसकी शिकायतें निराधार नहीं थीं।

जांच के आधार पर एसपी ने सख्त कार्रवाई करते हुए थाना प्रभारी निरीक्षक दिलीप कुमार सिंह, सिपाही पंकज मौर्य, नितेश कुमार गौड़ समेत चार पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। इसके साथ ही विवादित हल्का लेखपाल को भी निलंबन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इन सभी पर मुंगराबादशाहपुर थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई है, और विभागीय जांच भी शुरू कर दी गई है।

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यह मामला राज्य भर में चर्चा का विषय बन गया है, जहां एक नागरिक की वैधानिक पहल को दबाने के लिए प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग हुआ। यह प्रकरण न केवल पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका की सक्रियता और प्रशासन की पारदर्शी कार्रवाई से आम नागरिकों को न्याय मिलने की उम्मीद अभी भी जिंदा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि भविष्य में ऐसे मामलों पर प्रशासन और न्यायपालिका कितना सजग और संवेदनशील रहती है।

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