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Supreme Courtबड़ी खबर

बच्चे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पलटा खुद का फैसला !

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अभूतपूर्व और संवेदनशील निर्णय में 12 वर्षीय बच्चे की कस्टडी फिर से उसकी मां को सौंप दी है, अपनी ही 10 महीने पुरानी व्यवस्था को पलटते हुए। यह फैसला न सिर्फ कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को न्याय के केंद्र में रखने की मिसाल भी बन गया है।

इससे पहले कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी पिता को सौंप दी थी, लेकिन बाद में यह सामने आया कि यह निर्णय बच्चे के लिए मानसिक और भावनात्मक रूप से विनाशकारी साबित हुआ। तनाव की वजह से वह मानसिक इलाज की स्थिति में पहुंच गया। इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने पुराने आदेश को पलट दिया और बच्चे को मां की देखरेख में भेजने का निर्देश दिया।

फैसले में कोर्ट ने साफ कहा कि कस्टडी विवादों में सिर्फ कानूनी दलीलों और प्रक्रियाओं के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चे के हित और उसकी आवाज़ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति नाथ ने टिप्पणी की कि “हमने महसूस किया कि सिर्फ दलीलों के आधार पर फैसला देना एक बड़ी भूल थी। बच्चे की तकलीफ को हमने देर से महसूस किया, लेकिन अब सुधार करना जरूरी है।”

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कोर्ट ने इस बात को भी नोट किया कि बच्चा अब अपनी मां और सौतेले परिवार के साथ सुरक्षित और सहज महसूस कर रहा है। उसने खुद अपनी इच्छा ज़ाहिर की थी कि वह मां के पास वापस जाना चाहता है। यह एक मानवता से भरा क्षण था, जब कानून ने सिर्फ शब्दों और दलीलों पर नहीं, बल्कि दिल की आवाज़ पर फैसला सुनाया।

यह मामला देश की अदालतों को याद दिलाता है कि कस्टडी जैसे संवेदनशील मामलों में केवल कानून का कठोर पालन ही पर्याप्त नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, सहानुभूति और बच्चे के नजरिए को भी बराबर तवज्जो दी जानी चाहिए। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक संवेदनशील मानक स्थापित कर सकता है।

इस निर्णय ने एक बार फिर साबित किया है कि न्याय का असली अर्थ सिर्फ नियमों की व्याख्या नहीं, बल्कि इंसानियत के साथ न्याय करना है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन हजारों बच्चों और माता-पिता के लिए आशा की किरण बन सकता है, जो अदालतों से सिर्फ कानूनी नहीं, भावनात्मक न्याय भी मांगते हैं।

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