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सत्ता का संग्राम (Politics)

कांशीराम जयंती पर सियासी संग्राम! मायावती का अखिलेश पर सीधा वार, यूपी की राजनीति फिर हुई गर्म !

बहुजन राजनीति के केंद्र में रहने वाली मायावती ने एक बार फिर अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए उत्तर प्रदेश की सियासत को गरमा दिया है। मामला कांशीराम जयंती से जुड़ा है, जिसे लेकर समाजवादी पार्टी द्वारा कार्यक्रम और सम्मान समारोह आयोजित किए जाने के दावे सामने आए थे। इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए बसपा प्रमुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कड़ा बयान जारी किया, जिसने राजनीतिक माहौल को फिर से तेज बहस में बदल दिया।

मायावती ने अपने बयान में कहा कि समाजवादी पार्टी का “चाल, चरित्र और चेहरा” हमेशा से दलितों, पिछड़ों और बहुजन समाज के हितों के खिलाफ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा अब राजनीतिक लाभ के लिए बहुजन महापुरुषों के नाम और विरासत का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है, जबकि अतीत में पार्टी की राजनीति इसके उलट रही है। उनके इस बयान को सीधे तौर पर सपा की रणनीति पर हमला माना जा रहा है।

बसपा प्रमुख ने यह भी कहा कि बहुजन समाज के संतों और महापुरुषों का सम्मान केवल कार्यक्रम आयोजित करने से साबित नहीं होता, बल्कि नीतियों और कार्यशैली से दिखता है। उन्होंने इशारों-इशारों में सपा पर आरोप लगाया कि वह सिर्फ दिखावे की राजनीति कर रही है और वास्तविक सम्मान की भावना नहीं रखती। यह बयान बहुजन वोट बैंक को लेकर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का संकेत भी माना जा रहा है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और पिछड़ा वर्ग हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में कांशीराम जयंती जैसे अवसर राजनीतिक दलों के लिए प्रतीकात्मक ही नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद अहम हो जाते हैं। सपा द्वारा जयंती मनाने की पहल को कई राजनीतिक विश्लेषक नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं।

मायावती का यह बयान ऐसे समय आया है जब प्रदेश में आगामी चुनावों की तैयारी धीरे-धीरे तेज हो रही है। राजनीतिक दल अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने के साथ-साथ नए सामाजिक वर्गों को भी जोड़ने की रणनीति बना रहे हैं। इसी कारण महापुरुषों की विरासत और सामाजिक प्रतीकों को लेकर बयानबाजी भी बढ़ती नजर आ रही है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल बयान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले दिनों में सपा और बसपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो सकते हैं। दोनों दल बहुजन और पिछड़े वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत दिखाने की कोशिश में हैं, जिससे सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है।

सपा की ओर से अब तक आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित रही है, लेकिन पार्टी नेताओं ने पहले भी दावा किया है कि वे सामाजिक न्याय की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए सभी महापुरुषों का सम्मान करते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और बयान सामने आने की संभावना है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह टकराव सिर्फ दो नेताओं के बीच बयानबाजी नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों और राजनीतिक पहचान की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। कांशीराम की विरासत पर राजनीतिक दावेदारी ने यह साफ कर दिया है कि बहुजन राजनीति आज भी राज्य की सत्ता की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती है।

फिलहाल मायावती के इस तीखे बयान ने सियासी माहौल को गर्म कर दिया है और अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह विवाद सिर्फ शब्दों तक रहेगा या आने वाले समय में चुनावी रणनीति का बड़ा मुद्दा बन जाएगा।

written by :- Anjali Mishra

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