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पुल नहीं तो वोट नहीं !

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के हरैया ब्लॉक के ग्रामीणों ने वर्षों से लंबित मांग को लेकर अनोखा विरोध प्रदर्शन किया है। घाघरा नदी पर पुल निर्माण की मांग को लेकर ग्रामीण पानी में उतर गए और वहीं खड़े होकर सरकार के प्रति नाराज़गी जताई। यह दृश्य न सिर्फ प्रशासन के लिए एक संदेश था, बल्कि उस उपेक्षा की कहानी भी बयान कर रहा था, जो इन ग्रामीणों को सालों से झेलनी पड़ रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि वे बीते पाँच वर्षों से लगातार पुल की मांग कर रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन से अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। बरसात के मौसम में घाघरा नदी का जलस्तर बढ़ने से हालात और भी खराब हो जाते हैं। न तो बच्चों की पढ़ाई हो पाती है, न ही बीमार लोगों को समय पर इलाज मिल पाता है। रोजमर्रा के कामों में भी नदी पार करना जोखिम भरा हो जाता है। कई बार लोग नावों और टायर ट्यूब के सहारे जान हथेली पर रखकर नदी पार करने को मजबूर होते हैं।

प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने हाथों में तख्तियां और नारों वाले पोस्टर थाम रखे थे, जिन पर लिखा था – “हम पुल नहीं, तो वोट नहीं”, “पानी में खड़े हैं, लेकिन उम्मीद नहीं टूटी है”। महिलाओं से लेकर बुजुर्गों और युवाओं तक, हर वर्ग ने इस विरोध में हिस्सा लिया और अपनी बात शांतिपूर्वक तरीके से रखी। यह एक तरह का “जल सत्याग्रह” बन गया, जिसने शासन-प्रशासन को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

प्रदर्शनकारी ग्रामीणों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि जल्द ही पुल निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो वे आने वाले विधानसभा व लोकसभा चुनावों का बहिष्कार करेंगे। उनका कहना है कि जब सरकार बुनियादी सुविधाएं नहीं दे पा रही, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का क्या लाभ? यह चेतावनी राजनीतिक दलों के लिए भी गंभीर संकेत है, खासकर ऐसे समय में जब चुनावी तैयारियाँ धीरे-धीरे तेज हो रही हैं।

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इस मामले पर जब स्थानीय प्रशासन से प्रतिक्रिया मांगी गई, तो अधिकारियों ने जांच और समस्या को संबंधित विभाग तक पहुंचाने की बात कही। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि वे पहले भी कई बार ज्ञापन दे चुके हैं और विधायक-सांसदों से मिल चुके हैं, लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला, कार्यवाही नहीं। अब उन्होंने तय कर लिया है कि जब तक पुल की आधारशिला नहीं रखी जाती, उनका संघर्ष जारी रहेगा।

घाघरा नदी पर पुल का न बनना केवल एक विकास कार्य की अनदेखी नहीं, बल्कि एक पूरी आबादी के बुनियादी अधिकारों से वंचित रहने की कहानी है। यह विरोध सिर्फ एक पुल के लिए नहीं, बल्कि ग्रामीणों की अस्मिता, सुरक्षा और सम्मान की लड़ाई बन चुका है। अब देखना यह है कि प्रशासन और सरकार इस शांतिपूर्ण लेकिन प्रभावशाली आंदोलन पर क्या प्रतिक्रिया देती है – केवल आश्वासन या वास्तव में कार्रवाई।

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