‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर चिदंबरम का बड़ा विरोध, संविधान और बहुमत पर उठाए सवाल !
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी देश में लोकसभा और सभी विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कड़ा विरोध जताया है। संसद की संयुक्त समिति के सामने अपनी बात रखते हुए चिदंबरम ने प्रस्तावित विधेयकों को असंवैधानिक और बिना पर्याप्त विचार के उठाया गया कदम बताया। उन्होंने इस पूरी व्यवस्था के कानूनी और संवैधानिक प्रभावों पर गंभीर सवाल खड़े किए।
चिदंबरम की सबसे बड़ी आपत्ति विधानसभा के कार्यकाल को लेकर है। उनका तर्क है कि अगर किसी विधानसभा का संवैधानिक रूप से तय पांच साल का कार्यकाल बीच में ही समाप्त या कम कर दिया जाता है, तो इससे संविधान के मूल ढांचे का सवाल पैदा होता है। उनके मुताबिक, केवल चुनावों को एक साथ कराने के उद्देश्य से किसी निर्वाचित विधानसभा के कार्यकाल को छोटा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक सिद्धांतों पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
उन्होंने समिति के सामने अपने विरोध को बेहद स्पष्ट शब्दों में रखा। चिदंबरम ने कहा, “मेरा जमीर इन विधेयकों के समर्थन की गवाही नहीं देता।” इस बयान के जरिए उन्होंने संकेत दिया कि उनकी आपत्ति केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि वह इसे संवैधानिक और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं।
कांग्रेस नेता ने यह भी सवाल उठाया कि अगर किसी राज्य की विधानसभा और केंद्र की लोकसभा के चुनावों को एक साथ लाने के लिए चुनावी चक्र बदला जाता है, तो इससे राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता पर क्या असर पड़ेगा। उनके मुताबिक, अलग-अलग राज्यों में सरकारें अलग-अलग समय पर चुनी जाती हैं और उनके कार्यकाल को एक निश्चित चुनावी चक्र में फिट करने के लिए बदलाव करना संवैधानिक व्यवस्था में हस्तक्षेप के बराबर हो सकता है।
चिदंबरम ने प्रस्तावित कानून को लेकर सरकार की राजनीतिक ताकत पर भी सवाल उठाया। उन्होंने दावा किया कि सरकार के पास इस कानून को पारित कराने के लिए संसद में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं है। उनका कहना है कि इतने बड़े संवैधानिक बदलाव के लिए केवल साधारण राजनीतिक समर्थन पर्याप्त नहीं होगा और सरकार को आवश्यक संवैधानिक बहुमत जुटाना पड़ेगा।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के समर्थकों का तर्क है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों पर खर्च कम हो सकता है, चुनावी आचार संहिता के कारण विकास कार्यों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है और राजनीतिक दलों को लगातार चुनावी मोड में रहने से राहत मिल सकती है। वहीं विरोध करने वाले दलों का कहना है कि एक साथ चुनाव कराने के लिए राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में बदलाव करना लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।
यही वजह है कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का मुद्दा केवल चुनाव कराने की व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है। इसके केंद्र में संसद, विधानसभाओं के कार्यकाल, संघीय ढांचे, संविधान के मूल सिद्धांत और राजनीतिक सहमति जैसे कई बड़े मुद्दे हैं। चिदंबरम की आपत्तियों ने इसी व्यापक बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है।
कुल मिलाकर, पी. चिदंबरम ने संयुक्त समिति के सामने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के प्रस्ताव को लेकर संविधान, विधानसभा के कार्यकाल और सरकार के बहुमत तीनों मोर्चों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर किसी निर्वाचित विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल बीच में घटाया जाता है, तो यह संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित कर सकता है। अब इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच संवैधानिक तर्कों के साथ-साथ संसद में राजनीतिक बहस भी और तेज होने की संभावना है।
written by:- Anjali Mishra
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