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अब्बास अंसारी को हाईकोर्ट से बड़ी राहत – सजा पर रोक, विधायकी बहाल !

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम उस समय सामने आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मऊ के एमपी-एमएलए कोर्ट द्वारा सुनाई गई दो साल की सजा पर रोक लगा दी। यह फैसला सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के सहयोगी और मऊ सदर से विधायक रहे अब्बास अंसारी के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। हाईकोर्ट का यह आदेश उनकी उस याचिका पर आया है, जिसमें उन्होंने निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद न केवल उनकी सजा पर रोक लग गई है, बल्कि उनकी विधायकी भी बहाल हो जाएगी, जिससे मऊ सदर सीट पर होने वाला संभावित उपचुनाव अब टल गया है।

यह मामला 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से जुड़ा है। चुनाव प्रचार के दौरान अब्बास अंसारी पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगा था, जिसके बाद उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। एमपी-एमएलए कोर्ट ने इस मामले में उन्हें दोषी मानते हुए दो साल की सजा सुनाई थी। इस फैसले के बाद अब्बास अंसारी की विधानसभा सदस्यता स्वतः समाप्त हो गई थी और मऊ सदर सीट खाली मानी जा रही थी। लेकिन हाईकोर्ट के ताज़ा आदेश ने इस स्थिति को पूरी तरह पलट दिया है और अब वे फिर से विधानसभा सदस्य बने रहेंगे।

कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए तो जनप्रतिनिधि कानून (Representation of People Act) के तहत दो साल या उससे अधिक की सजा मिलने पर विधायक या सांसद की सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। यही कारण था कि सजा सुनाए जाने के बाद मऊ सदर सीट खाली घोषित कर दी गई थी और उपचुनाव की तैयारी भी शुरू हो गई थी। लेकिन अब हाईकोर्ट की रोक ने इस पूरी प्रक्रिया को थाम दिया है। इससे न केवल अब्बास अंसारी को राजनीतिक जीवन में राहत मिली है, बल्कि प्रदेश की सियासत में भी हलचल मच गई है।

मऊ की राजनीति लंबे समय से अंसारी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अब्बास अंसारी, माफिया से राजनेता बने मुख्तार अंसारी के बेटे हैं। ऐसे में उनका विधायक बने रहना न केवल स्थानीय राजनीति बल्कि प्रदेश स्तर की समीकरणों के लिहाज से भी अहम है। अगर उपचुनाव होता तो यह भाजपा और विपक्षी दलों के बीच सीधी टक्कर का मैदान बन सकता था। लेकिन उपचुनाव टलने से कई राजनीतिक दलों की रणनीति पर पानी फिर गया है। विशेषकर भाजपा, जो इस सीट पर जीत दर्ज करने के लिए जोर-शोर से तैयारी कर रही थी, उसे झटका लगा है।

कानूनी लड़ाई के मोर्चे पर यह फैसला अब्बास अंसारी के लिए अस्थायी राहत है। चूंकि यह केवल सजा पर रोक है, इसलिए केस पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। आगे भी मामले की सुनवाई जारी रहेगी और अंतिम फैसला आने तक उन्हें कानूनी दांव-पेंच का सामना करना होगा। हालांकि, हाईकोर्ट का यह आदेश फिलहाल उनके लिए राजनीतिक अस्तित्व बचाने में सबसे बड़ा सहारा साबित हुआ है।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से विपक्ष को एक बड़ा मनोबल मिलेगा और अंसारी परिवार का दबदबा मऊ की राजनीति में और भी मजबूत होगा। दूसरी ओर, भाजपा और अन्य दलों के लिए यह फैसला अप्रत्याशित झटका है, क्योंकि उपचुनाव में उन्हें फायदा मिलने की उम्मीद थी। कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश सिर्फ एक कानूनी राहत भर नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा मोड़ भी है। आने वाले दिनों में इस मामले की अगली सुनवाई और उसमें आने वाला फैसला एक बार फिर प्रदेश की सियासत में हलचल मचा सकता है।

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