त्योहार, विज्ञापन और विवाद! क्या Controversy ही बन गई है Brands की Marketing Strategy?
क्या हिंदू त्योहारों पर विज्ञापन बनाते समय ब्रांड्स जानबूझकर ऐसे मुद्दे छेड़ रहे हैं, जिनसे विवाद पैदा हो? यह सवाल रक्षाबंधन के मौके पर GIVA के कृति सेनन वाले विज्ञापन के बाद फिर चर्चा में है। विज्ञापन में कृति सेनन पहले अपने भाई और फिर घर के कुत्ते को राखी बांधती नजर आईं। इसके अलावा उनके पहनावे को लेकर भी सोशल मीडिया पर लोगों के एक वर्ग ने सवाल उठाए। देखते ही देखते विज्ञापन सोशल मीडिया पर बहस और विरोध का मुद्दा बन गया।
विरोध करने वालों का तर्क था कि रक्षाबंधन सिर्फ एक सामान्य त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते और पारंपरिक भावनाओं से जुड़ा पर्व है। इसलिए विज्ञापन बनाते समय इसकी मर्यादा और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखा जाना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ विज्ञापन के समर्थकों ने कहा कि किसी महिला के कपड़े उसकी व्यक्तिगत पसंद हैं और उसे उसके पहनावे के आधार पर जज नहीं किया जाना चाहिए। जानवरों को परिवार का हिस्सा मानकर त्योहारों में शामिल करने की परंपरा भी कई घरों में देखने को मिलती है।
विवाद बढ़ने के बाद कृति सेनन ने ट्रोलिंग का जवाब देते हुए कहा कि संस्कृति सिर्फ कपड़ों में नहीं, बल्कि भावनाओं में होती है। महिलाओं के पहनावे और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर राहुल गांधी की टिप्पणी का भी जिक्र इस बहस में हुआ। यानी मामला सिर्फ एक विज्ञापन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें संस्कृति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिला अधिकार और धार्मिक भावनाओं जैसे कई सवाल जुड़ गए।
इसके बाद सोशल मीडिया पर GIVA के बहिष्कार की मांग भी उठने लगी। विवाद बढ़ता देख कंपनी ने विज्ञापन हटा लिया और सफाई दी कि किसी की भावनाओं को आहत करना उसका उद्देश्य नहीं था। लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है अगर किसी विज्ञापन को लेकर इतना बड़ा विवाद पैदा होने के बाद उसे हटाना पड़े, तो क्या विज्ञापन बनाने से पहले ब्रांड्स को संभावित प्रतिक्रियाओं का अंदाजा नहीं होता?
दरअसल, यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि त्योहारों पर विज्ञापनों को लेकर विवाद कोई बिल्कुल नई घटना नहीं है। सर्फ एक्सेल, तनिष्क, फैबइंडिया, सीएट और डाबर जैसे कई बड़े ब्रांड्स के विज्ञापन भी अलग-अलग समय पर धार्मिक या सांस्कृतिक भावनाओं को लेकर विवादों में आ चुके हैं। कुछ मामलों में कंपनियों को विज्ञापन वापस लेने पड़े या स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा। इससे यह बहस लगातार बनी हुई है कि क्या कंपनियां सांस्कृतिक संवेदनशीलता को पर्याप्त गंभीरता से समझती हैं।
अब इसका दूसरा पहलू भी देखना जरूरी है। आज सोशल मीडिया के दौर में विवाद अपने आप में बड़ी पब्लिसिटी बन सकता है। जिस विज्ञापन को सामान्य परिस्थितियों में सीमित संख्या में लोग देखते, विवाद होने के बाद वही विज्ञापन लाखों लोगों की चर्चा में आ सकता है। न्यूज कवरेज, सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और बहसों के जरिए ब्रांड का नाम तेजी से फैलता है। इसे कभी-कभी ‘earned media’ या विवाद से मिलने वाली मुफ्त चर्चा के नजरिए से देखा जा सकता है।
लेकिन इसका मतलब यह साबित नहीं करता कि हर विवादित विज्ञापन जानबूझकर विवाद पैदा करने के लिए ही बनाया गया था। किसी ब्रांड के लिए धार्मिक या सांस्कृतिक विषय पर गलत आकलन करना भी संभव है। क्रिएटिव टीम जिस संदेश को समावेशी या आधुनिक मानती है, वही संदेश किसी दूसरे वर्ग को अपनी परंपराओं के प्रति असंवेदनशील लग सकता है। इसलिए हर विवाद को सीधे ‘जानबूझकर की गई मार्केटिंग’ कहना भी सही नहीं होगा।
फिर भी सवाल अपनी जगह बेहद बड़ा है क्या कुछ ब्रांड अब यह मानने लगे हैं कि विवाद से मिलने वाली चर्चा, विज्ञापन पर होने वाले खर्च से ज्यादा प्रभावी हो सकती है? अगर ऐसा है तो यह मार्केटिंग का बेहद जोखिम भरा फॉर्मूला है। क्योंकि वायरल होने से ब्रांड को पहचान तो मिल सकती है, लेकिन अगर विवाद बहुत बड़ा हो जाए तो वही पब्लिसिटी बॉयकॉट, ग्राहक खोने और ब्रांड की छवि खराब होने में भी बदल सकती है।
आखिर में फैसला दर्शकों को ही करना है। क्या GIVA जैसा विवाद सिर्फ एक क्रिएटिव फैसले का नतीजा था? या फिर त्योहारों और धार्मिक भावनाओं से जुड़े संवेदनशील विषयों पर विवाद अब ब्रांड्स के लिए एक तरह का ‘मार्केटिंग शॉर्टकट’ बनता जा रहा है? वायरल होना जरूरी है या लोगों की भावनाओं का सम्मान करना ब्रांड्स की असली प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
written by:- Anjali Mishra
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