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दुनिया का दंगल (International)

परमाणु समझौता पीछे छूटा, अब होर्मुज पर दांव!

ईरान के साथ जारी संघर्ष अगर लंबा खिंचता है, तो अमेरिका की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब चर्चा केवल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी औपचारिक समझौते तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि युद्ध को समाप्त करने के लिए ऐसे रास्ते तलाशे जा रहे हैं जिनमें सबसे अहम मुद्दा होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा सामान्य रूप से खोलना बन सकता है। रिपोर्टों में सामने आए संकेतों के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इस संभावना पर विचार कर सकता है कि बिना किसी व्यापक परमाणु समझौते के भी संघर्ष को रोकने का रास्ता निकाला जाए, लेकिन इसके लिए होर्मुज में जहाजों की आवाजाही सामान्य होना बेहद महत्वपूर्ण शर्त बन सकती है।

होर्मुज स्ट्रेट की अहमियत को समझना जरूरी है, क्योंकि यह सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन में से एक है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया के बड़े तेल और गैस निर्यात क्षेत्रों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ता है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने की आशंका भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में घबराहट पैदा कर सकती है। बीमा लागत बढ़ सकती है, शिपिंग महंगी हो सकती है और तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए अमेरिका के लिए होर्मुज को खुला रखना केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा और आर्थिक स्थिरता का भी बड़ा मुद्दा है।

यही वजह है कि युद्ध को लंबा खींचना अमेरिका के लिए भी आसान विकल्प नहीं है। अगर संघर्ष लगातार जारी रहता है और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। महंगा ईंधन आम लोगों की जेब पर असर डालता है और महंगाई को बढ़ा सकता है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के सामने एक तरफ ईरान पर दबाव बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ ऐसा रास्ता खोजने का दबाव भी है जिससे युद्ध का आर्थिक और राजनीतिक बोझ कम किया जा सके।

लेकिन दूसरी तरफ ईरान की स्थिति भी आसान नहीं है। तेहरान केवल अस्थायी शांति या सीमित युद्धविराम से संतुष्ट होने के बजाय व्यापक शर्तें सामने रख सकता है। इनमें स्थायी युद्धविराम, नौसैनिक नाकाबंदी हटाना, अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत या समाप्ति और क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम करने जैसी मांगें शामिल हो सकती हैं। यानी अगर अमेरिका होर्मुज को पूरी तरह खोलने की उम्मीद करता है, तो ईरान भी बदले में ऐसी गारंटी चाहता है जिससे उसे यह भरोसा हो कि युद्धविराम के बाद उस पर दोबारा सैन्य या आर्थिक दबाव नहीं बढ़ेगा।

यहीं से बातचीत का सबसे मुश्किल हिस्सा शुरू होता है। अमेरिका चाहता है कि समुद्री मार्ग सुरक्षित और सामान्य रहे, जबकि ईरान सुरक्षा, प्रतिबंधों और अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को अपने लिए बड़े मुद्दे के रूप में देखता है। दोनों पक्षों की प्राथमिकताएं अलग हैं और यही किसी भी संभावित समझौते को बेहद जटिल बना सकता है। अगर एक पक्ष को लगता है कि दूसरा अपनी शर्तें मनवाने के लिए युद्धविराम का इस्तेमाल कर रहा है, तो बातचीत दोबारा टकराव की ओर जा सकती है।

ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन की क्षमता के साथ-साथ पश्चिम एशिया में उसके सहयोगी सशस्त्र समूहों का व्यापक नेटवर्क भी है। ऐसे संसाधन किसी भी लंबे संघर्ष को अधिक जटिल बना सकते हैं। दूसरी ओर अमेरिका के पास दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य क्षमताओं में से एक है, लेकिन लंबा युद्ध उसके लिए भी राजनीतिक और आर्थिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। खासकर तब, जब ऊर्जा कीमतों में उछाल का असर अमेरिकी मतदाताओं और घरेलू अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगे।

इस पूरे समीकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखने की गारंटी युद्धविराम के लिए पर्याप्त आधार बन सकती है? अगर ईरान समुद्री मार्ग को सामान्य करने के बदले प्रतिबंधों में राहत और अमेरिकी सैन्य वापसी जैसी मांगों पर जोर देता है, तो अमेरिका को कई मोर्चों पर संतुलन बनाना पड़ेगा। वहीं ट्रंप के लिए चुनौती यह होगी कि वह ऐसा समझौता कैसे तैयार करते हैं जिसे अमेरिका में कमजोरी के संकेत के रूप में न देखा जाए और ईरान भी उसे स्वीकार कर सके।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ट्रंप वास्तव में परमाणु समझौते को पीछे छोड़कर केवल होर्मुज के मुद्दे पर युद्ध समाप्त करने का फैसला करेंगे। लेकिन अगर बातचीत का केंद्र परमाणु कार्यक्रम से हटकर युद्धविराम, समुद्री मार्ग की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति की बहाली बनता है, तो यह पूरे पश्चिम एशिया के समीकरण को बदल सकता है। आने वाले दिनों में असली परीक्षा इसी बात की होगी कि क्या अमेरिका और ईरान अपनी-अपनी कठोर शर्तों से आगे बढ़कर कोई ऐसा रास्ता निकाल पाते हैं, जिसमें होर्मुज खुले, युद्ध रुके और दोनों पक्षों को कम से कम कुछ राजनीतिक और रणनीतिक फायदा मिल सके।

written by :- Anjali Mishra

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