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बंद स्कूलों में लहराएगा तिरंगा – सपा का ऐलान !

उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश के उन लगभग 5,000 प्राइमरी स्कूलों को बंद करने का आदेश दिया है, जहां छात्रों की संख्या बेहद कम है। सरकार का तर्क है कि इस फैसले से शिक्षा व्यवस्था में सुधार होगा, संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा और शैक्षिक गुणवत्ता बढ़ेगी। इन स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मर्ज किया जाएगा ताकि शिक्षक और छात्रों दोनों को बेहतर माहौल मिल सके। लेकिन यह फैसला अब सियासी विवाद का कारण बन गया है, क्योंकि इससे हजारों गांवों और छोटे समुदायों में शिक्षा की पहुंच पर खतरा मंडराने लगा है।

इस मुद्दे को लेकर विपक्ष विशेषकर समाजवादी पार्टी (सपा) ने प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लिया है। सपा नेताओं का कहना है कि शिक्षा का अधिकार हर बच्चे का मौलिक हक है और सरकार का यह कदम ग्रामीण शिक्षा को खत्म करने जैसा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार की नीतियां लगातार गरीब और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा के अधिकार को कमजोर कर रही हैं। सपा प्रमुख ने यहां तक कह दिया कि सरकार स्मार्ट सिटी और एक्सप्रेसवे के नाम पर प्राथमिक जरूरतों की बलि चढ़ा रही है। उनका कहना है कि स्कूलों को बंद कर देना विकास नहीं, बल्कि शिक्षा की कब्र खोदने जैसा है।

इस पूरे विवाद ने तब और तूल पकड़ लिया जब समाजवादी पार्टी ने घोषणा कर दी कि 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर वे पूरे प्रदेश में बंद किए गए स्कूलों में जाकर तिरंगा फहराएंगे। पार्टी का कहना है कि ये स्कूल भले ही सरकार की नजर में अनुपयोगी हों, लेकिन इनके आंगन में बच्चों ने सपने देखे हैं, वहां पढ़ाई के सपने पले हैं। इस प्रतीकात्मक आंदोलन के ज़रिए सपा उन सपनों को फिर से जगाना चाहती है। पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि वे गांव-गांव जाकर स्कूलों की स्थिति की जानकारी लें और स्वतंत्रता दिवस पर उन स्कूलों को फिर से जीवित करने का प्रयास करें।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में और गरमा सकता है। एक ओर सरकार शिक्षा के केंद्रीकरण और मर्जर को भविष्य के लिए जरूरी सुधार मानती है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे गांवों से शिक्षा छीनने की साजिश बता रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सरकार ने यह फैसला जमीनी हालात को देखे बिना लिया है? क्या यह मुमकिन नहीं था कि स्कूलों को बंद करने की बजाय उनमें संसाधन बढ़ाए जाते, बच्चों के दाखिले के लिए अभियान चलाए जाते या स्थानीय शिक्षकों की भागीदारी को मज़बूत किया जाता?

इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा केवल स्कूल और क्लासरूम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक विमर्श का भी अहम मुद्दा बन चुकी है। स्कूलों का बंद होना न सिर्फ छात्रों की पढ़ाई पर असर डालता है, बल्कि समाज के विकास पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। यदि बच्चों को उनके गांव में ही शिक्षा नहीं मिलेगी, तो क्या वे सच में ‘डिजिटल इंडिया’ या ‘नई शिक्षा नीति’ का हिस्सा बन पाएंगे? विपक्ष के विरोध और जनता की नाराजगी को देखते हुए सरकार को अब इस फैसले पर पुनर्विचार करने की जरूरत है – ताकि शिक्षा की मशाल गांव-गांव जलती रहे और कोई बच्चा पढ़ाई के हक से वंचित न रहे।

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