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न्याय की देरी से अन्याय,लखन की कहानी, जो 48 साल तक जेल में रहे बिना कसूर के !

48 साल काटी सजा, 103 साल की आयु में जेल से निकले… कौशांबी के लखन की आंखों में फिर मायूसी आखिर क्यों? 48 साल… बिना कसूर, सलाखों के पीछे। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि हमारे देश व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल है। लखन एक साधारण इंसान, जिसके पास न पैसा था, न वकील… और अब न उम्र बची है, न परिवार। चार दशक से भी ज़्यादा वक्त जेल में काट दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो ग़रीब था। आख़िर में अदालत ने कहा आप निर्दोष हैं, जा सकते हैं। पर अब वो जाए कहां? किसके लिए जिए…? किसके लिए लड़े…? ,क्या गरीबी सबसे बड़ा अपराध बन गई है? क्या भारत की न्याय व्यवस्था इतनी कमजोर है कि 48 साल की ज़िंदगी सिर्फ इंतज़ार और अंधेरे में खो जाए…? ये सिर्फ लखन की कहानी नहीं, उस पूरे सिस्टम की कहानी है, जो ‘देरी से मिला न्याय, अन्याय’ बन चुका है।सोचिए… और पूछिए क्या यही न्याय है? इस पुरे मामले की शुरुवात होती है उत्तर प्रदेश के कौशांबी से जहा कौशांबी में हत्याकांड के एक आरोपी की रिहाई की चर्चा हो रही है।

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जेल से छूटकर आने के बाद कैदी खूब सुर्खियां बटोर रहा है। दरअसल, जेल से छूटकर आए कैदी की उम्र 103 साल है। वह 48 सालों से जेल में बंद था। परिजन से उसे छुड़ाने की मशक्कत करते रहे। आखिरकार जब वह छूटकर अपने गांव पहुंचे तो देखा, सभी संगी-साथी की मौत हो चुकी है। घर में भी अधिकांश लोगों को वह नहीं पहचानते। ऐसे में उनकी आंखों में रिहाई के बाद वाली खुशी गुम हो गई। वह मायूस दिखाई दिए। कौशांबी जिले में 103 साल के बुजुर्ग लखन की 48 साल बाद जेल से रिहाई हुई। लखन पुत्र मंगली को वर्ष 1977 में गांव के ही एक व्यक्ति की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा मिली थी। तब से वह जेल में बंद थे। अब उनकी रिहाई जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की पहल पर संभव हो सकी है। लखन को रिहा कराने के लिए उनके परिजन दशकों से प्रयासरत थे, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी। उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचने के बाद परिजनों ने मानवीय आधार पर रिहाई की गुहार लगाई।

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