पुतिन की भारत यात्रा के बीच क्रूड का $100 पार! मोदी के सामने तेल का बड़ा सवाल ।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा पर दुनिया की नजरें टिकी हैं, लेकिन इस मुलाकात के बीच एक ऐसा मुद्दा है जो भारत से लेकर अमेरिका तक चिंता बढ़ा रहा है कच्चे तेल की कीमत। अमेरिका-ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। जुलाई के बाद पहली बार तेल ने यह स्तर पार किया है।
ऐसे माहौल में पीएम मोदी और पुतिन की बातचीत में तेल से जुड़े मुद्दे अहम हो सकते हैं। रूस भारत के प्रमुख ऊर्जा साझेदारों में शामिल है और ऐसे समय में जब वैश्विक सप्लाई पर दबाव है, भारत के लिए स्थिर और किफायती कच्चे तेल की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। पुतिन की 11 सितंबर की भारत यात्रा BRICS बैठक के साथ हो रही है, इसलिए ऊर्जा और वैश्विक बाजार की स्थिति पर बातचीत की अहमियत और बढ़ जाती है।
दूसरी तरफ अमेरिका में महंगा ईंधन ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। अमेरिकी डीजल की औसत कीमत करीब 5.85 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच चुकी है, जो रिकॉर्ड स्तर है। इसका असर सिर्फ गाड़ियों के ईंधन खर्च तक सीमित नहीं है। डीजल ट्रांसपोर्ट, खेती और सामान की सप्लाई में बड़ी भूमिका निभाता है, इसलिए इसकी कीमत बढ़ने से रोजमर्रा की चीजों की लागत भी बढ़ सकती है।
महंगे तेल का राजनीतिक असर भी दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट नवंबर के मध्यावधि चुनाव के बाद शुरू हो सकती है। यानी अमेरिका में महंगाई और ईंधन की कीमतें अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति से भी जुड़ गई हैं।
अब इसका असर भारत पर समझिए। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने का सीधा असर भारत के इंपोर्ट बिल पर पड़ता है। डॉलर में ज्यादा भुगतान करना पड़ने से व्यापार संतुलन और रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें स्थिर हैं, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों पर दबाव तेजी से बढ़ा है। ICRA और दूसरे विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक सितंबर में तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 5 रुपये और डीजल पर करीब 23 रुपये प्रति लीटर की नकारात्मक मार्केटिंग मार्जिन का सामना करना पड़ रहा है। घरेलू LPG पर भी अंडर-रिकवरी बढ़ने का दबाव है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल-डीजल या LPG की कीमत तुरंत बढ़ने वाली है। सरकार और तेल कंपनियां कुछ समय तक बढ़ी हुई लागत को खुद भी absorb कर सकती हैं। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय क्रूड लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है, तो कंपनियों की वित्तीय स्थिति और देश के आयात बिल पर दबाव और बढ़ सकता है।
यही वजह है कि पुतिन की भारत यात्रा को सिर्फ रक्षा या रणनीतिक रिश्तों के नजरिए से नहीं देखा जा रहा। तेल, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक सप्लाई भी बातचीत के बड़े मुद्दे बन सकते हैं। एक तरफ अमेरिका महंगे ईंधन और चुनावी दबाव से जूझ रहा है, दूसरी तरफ भारत के सामने सस्ते और स्थिर ऊर्जा स्रोत बनाए रखने की चुनौती है। अब बड़ा सवाल यही है क्या मोदी-पुतिन की बातचीत से भारत को महंगे क्रूड के इस दौर में कोई बड़ी राहत या रणनीतिक फायदा मिल सकता है?
written by:- Anjali Mishra
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