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झारखंड में छात्रों का आंदोलन हुआ और उग्र! JSSC-CGL रद्द कराने की मांग पर अड़े युवा, पुलिस कार्रवाई के बाद बढ़ा सियासी घमासान!

झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे छात्रों का आंदोलन अब एक बड़े टकराव में बदलता दिखाई दे रहा है। JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन लगातार लंबा खिंच रहा है और अब हजारों छात्र सड़क पर उतर चुके हैं। छात्रों का कहना है कि मामला सिर्फ किसी एक परीक्षा का नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के भविष्य का है जो सरकारी नौकरी की तैयारी में वर्षों की मेहनत और समय लगा रहे हैं। उनकी मुख्य मांगों में JSSC-CGL परीक्षा रद्द करना, कथित गड़बड़ियों की CBI जांच और भर्ती प्रक्रिया में व्यापक सुधार शामिल हैं।

छात्रों और सरकार के बीच सबसे बड़ा मतभेद इस बात को लेकर है कि सरकार उनकी कितनी मांगें स्वीकार कर चुकी है। राज्य सरकार की ओर से दावा किया गया है कि प्रदर्शनकारियों की करीब 98 फीसदी मांगें मान ली गई हैं, लेकिन आंदोलनकारी छात्र इस दावे से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि जब तक JSSC-CGL जैसी विवादित परीक्षा को लेकर स्पष्ट फैसला और स्वतंत्र जांच की मांग पूरी नहीं होती, तब तक आंदोलन खत्म नहीं किया जाएगा। यही असहमति अब सरकार और छात्रों के बीच गतिरोध की सबसे बड़ी वजह बन गई है।

आंदोलन उस समय और तेज हो गया जब बड़ी संख्या में छात्र रांची में विधानसभा की ओर मार्च करने पहुंचे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की और स्थिति बिगड़ने के बाद आंसू गैस, पानी की बौछार और बल प्रयोग की खबरें सामने आईं। इस कार्रवाई ने पहले से चल रहे विवाद को और राजनीतिक रंग दे दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अपने भविष्य और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, जबकि प्रशासन के सामने भीड़ को नियंत्रित करने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती थी।

इस पूरे घटनाक्रम में छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो भी आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर सामने आए हैं। वह अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे और खराब होती तबीयत के बावजूद विधानसभा मार्च में एंबुलेंस के जरिए शामिल हुए। बाद में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति ने आंदोलन को और भावनात्मक बना दिया है और प्रदर्शनकारी लगातार उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता जता रहे हैं।

दूसरी तरफ इस आंदोलन में अब राजनीति की एंट्री भी साफ दिखाई दे रही है। झारखंड के नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने छात्रों की मांगों का समर्थन करते हुए सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर CBI जांच की मांग का समर्थन किया है। विधानसभा और मुख्यमंत्री आवास के आसपास विरोध-प्रदर्शन को लेकर भी भाजपा और सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए हैं। मरांडी समेत भाजपा नेताओं की हिरासत ने भी इस विवाद को और राजनीतिक बना दिया।

लेकिन सरकार का पक्ष भी सामने है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से छात्रों से संवाद और उनकी चिंताओं पर बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात कही गई है। सरकार का कहना है कि छात्रों की मांगों को गंभीरता से लिया जा रहा है और बातचीत के रास्ते खुले हैं। यानी एक तरफ सरकार दावा कर रही है कि उसने बड़ी संख्या में मांगों को स्वीकार किया है, जबकि दूसरी तरफ छात्र कह रहे हैं कि उनकी मुख्य मांगें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं। यही वजह है कि बातचीत के बावजूद जमीन पर आंदोलन थम नहीं रहा है।

इस आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल अब भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता बन गया है। युवाओं के लिए सरकारी नौकरी पहले ही बेहद प्रतिस्पर्धी क्षेत्र है। ऐसे में अगर किसी परीक्षा की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तो उसका असर सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक तैयारी की, पैसा खर्च किया और अपना समय लगाया है। इसलिए वे चाहते हैं कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो और अगर किसी परीक्षा में गंभीर अनियमितता साबित होती है तो उसके खिलाफ स्पष्ट और भरोसेमंद कार्रवाई की जाए।

अब यह आंदोलन सिर्फ छात्रों और सरकार के बीच विवाद नहीं रह गया है। पुलिस कार्रवाई, विपक्ष का समर्थन, भूख हड़ताल और विधानसभा मार्च ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। दूसरी तरफ सरकार के सामने चुनौती है कि वह छात्रों की नाराजगी को बातचीत के जरिए शांत करे और भर्ती प्रक्रिया को लेकर भरोसा बहाल करे। अगर दोनों पक्षों के बीच जल्द कोई ठोस समाधान नहीं निकलता, तो आंदोलन और लंबा खिंच सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार JSSC-CGL को लेकर छात्रों की मुख्य मांग पर कोई बड़ा फैसला लेगी? क्या CBI जांच की मांग स्वीकार होगी? क्या परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया में ऐसे सुधार किए जाएंगे जिससे युवाओं का भरोसा वापस लौट सके? और दूसरी तरफ, क्या आंदोलनकारी छात्र सरकार के अगले प्रस्ताव पर बातचीत के लिए तैयार होंगे? फिलहाल दोनों पक्षों के बीच दूरी बनी हुई है।

यानी झारखंड में यह लड़ाई अब सिर्फ एक परीक्षा रद्द कराने की मांग नहीं रह गई है। यह लड़ाई युवाओं के भरोसे, भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और सरकारी नौकरियों के भविष्य से जुड़ गई है। हजारों छात्र सड़क पर हैं, एक प्रमुख छात्र नेता अस्पताल पहुंच चुका है और विपक्ष सरकार पर लगातार दबाव बना रहा है। अब देखना होगा कि सरकार और छात्रों के बीच यह टकराव बातचीत से खत्म होता है या झारखंड की सड़कों पर युवाओं का आंदोलन और बड़ा रूप लेता है।

written by :- sherry akash

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