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दो PM जिन्हें कभी नहीं मिला लाल किले पर तिरंगा फहराने का मौका !

स्वतंत्रता दिवस का दिन भारत के हर प्रधानमंत्री के लिए गौरव और सम्मान का प्रतीक होता है। यह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश की आज़ादी, लोकतंत्र और संप्रभुता का उत्सव है। जब प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं, तो वह पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा और एकता का संदेश होता है। यह क्षण न केवल प्रधानमंत्री के राजनीतिक करियर का अहम पड़ाव होता है, बल्कि उनके नेतृत्व की ऐतिहासिक पहचान भी बन जाता है। हालांकि, देश के इतिहास में कुछ ऐसे दुर्लभ अवसर भी आए हैं जब प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी किसी को यह अवसर नहीं मिला।

गुलजारीलाल नंदा ऐसे ही प्रधानमंत्री थे, जिन्हें यह सम्मान प्राप्त नहीं हो सका। नंदा दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने—पहली बार 27 मई 1964 को, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ, और दूसरी बार 11 जनवरी 1966 को, जब लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में देहांत हुआ। दोनों ही बार उनका कार्यकाल मात्र 13-13 दिनों का रहा। दिलचस्प बात यह रही कि इन दोनों कार्यकालों में 15 अगस्त की तारीख नहीं आई। इसलिए, परिस्थितिवश वे लाल किले पर तिरंगा नहीं फहरा सके। यह एक ऐसा संयोग था जो भारतीय राजनीति में बहुत ही कम देखने को मिलता है।

इसी तरह, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का कार्यकाल भी स्वतंत्रता दिवस के उत्सव से वंचित रह गया। चंद्रशेखर ने 10 नवंबर 1990 को प्रधानमंत्री पद संभाला और 21 जून 1991 को पद छोड़ दिया। उनके कार्यकाल में एक 15 अगस्त जरूर आया, लेकिन उस समय तक उनका सरकार से संबंध परिस्थितियों के कारण बदल चुका था। दरअसल, उस वक्त राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन की खींचतान के चलते वे स्वतंत्रता दिवस के मुख्य कार्यक्रम में लाल किले से झंडा नहीं फहरा पाए। इस तरह, चंद्रशेखर भी उन कुछ प्रधानमंत्रियों में शामिल हो गए, जिन्हें यह ऐतिहासिक अवसर नहीं मिला।

इन घटनाओं से यह साफ होता है कि लाल किले से तिरंगा फहराने का मौका केवल प्रधानमंत्री पद पर बैठने से ही नहीं मिलता, बल्कि उसके लिए समय और राजनीतिक परिस्थितियां भी अनुकूल होनी चाहिए। यह जिम्मेदारी और सम्मान एक निर्धारित अवसर पर ही मिलता है—हर साल 15 अगस्त को। अगर प्रधानमंत्री का कार्यकाल इस तारीख से पहले या बाद में शुरू और खत्म हो जाए, तो यह मौका छूट सकता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो नंदा और चंद्रशेखर का यह अनुभव भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ अध्याय है।

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गौर करने वाली बात यह है कि भारत के इतिहास में अधिकतर प्रधानमंत्रियों को यह मौका मिला है, चाहे उनका कार्यकाल छोटा ही क्यों न रहा हो। उदाहरण के लिए, इंदर कुमार गुजराल और एच. डी. देवगौड़ा जैसे प्रधानमंत्रियों ने भी कम समय तक पद संभाला, लेकिन उनके कार्यकाल में 15 अगस्त आया और उन्होंने लाल किले से झंडा फहराने का गौरव पाया। इसलिए नंदा और चंद्रशेखर का मामला केवल संयोग और परिस्थितियों का परिणाम माना जा सकता है।

अंततः, लाल किले से तिरंगा फहराना न केवल एक प्रधानमंत्री की आधिकारिक जिम्मेदारी है, बल्कि यह उस समय की राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्र की एकजुटता का प्रतीक भी है। गुलजारीलाल नंदा और चंद्रशेखर के उदाहरण हमें यह याद दिलाते हैं कि इतिहास के पन्नों में दर्ज हर घटना के पीछे केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि समय, स्थिति और संयोग भी अहम भूमिका निभाते हैं। इन दोनों नेताओं का प्रधानमंत्री के रूप में योगदान भले ही अल्पकालिक रहा हो, लेकिन उनके कार्यकाल के ये विशेष प्रसंग आने वाली पीढ़ियों को भारतीय लोकतंत्र की विविधताओं और अनोखे संयोगों के बारे में हमेशा याद दिलाते रहेंगे।

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