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ईरान से गायब 400 किलो यूरेनियम: अमेरिका की चिंता और परमाणु सौदे की नई शतरंज

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एबीसी न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में सनसनीखेज खुलासा किया है कि ईरान के एक प्रमुख परमाणु ठिकाने पर अमेरिकी ‘बंकर बस्टर’ बमबारी के बाद से लगभग 400 किलोग्राम उच्च-शुद्धता वाले यूरेनियम का कोई सुराग नहीं मिल रहा है, जो अमेरिका समेत पूरे पश्चिमी जगत की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। यह यूरेनियम 60 प्रतिशत तक शुद्ध है, जो तकनीकी रूप से बेहद खतरनाक सीमा मानी जाती है क्योंकि इसे सिर्फ थोड़े से अतिरिक्त परिष्करण के बाद लगभग 90 प्रतिशत तक शुद्ध किया जा सकता है — यही वह स्तर है जो परमाणु हथियारों के निर्माण के लिए आवश्यक होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गायब हुआ यूरेनियम ईरान की ओर से एक रणनीतिक ‘परमाणु दांव’ हो सकता है, जिसे वह अमेरिका के साथ किसी भी भावी परमाणु समझौते की बातचीत में एक दबाव वाले हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। स्थिति को और चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि अमेरिका के खुफिया तंत्र को अब तक यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है कि यह यूरेनियम किस स्थान पर गया, किसके नियंत्रण में है, और क्या यह किसी गुप्त परमाणु कार्यक्रम या हथियार निर्माण की दिशा में पहले ही उपयोग हो चुका है। इस संदिग्ध गतिविधि ने न केवल अमेरिका-ईरान संबंधों को फिर से तनावपूर्ण बना दिया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और संयुक्त राष्ट्र को भी हरकत में ला दिया है, जो अब इस मसले पर विस्तृत और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं। वाशिंगटन में नीति-निर्माता और सैन्य रणनीतिकार इस आशंका को लेकर भी सतर्क हो गए हैं कि कहीं यह यूरेनियम किसी तीसरे देश या आतंकी संगठन के हाथ न लग जाए, जिससे पश्चिम एशिया में अस्थिरता का खतरा और भी अधिक बढ़ सकता है। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही तनावपूर्ण राजनयिक संबंधों को लेकर वैश्विक समुदाय चौकस है, और परमाणु हथियारों के प्रसार पर नियंत्रण रखने की तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियों की साख दांव पर लगी हुई है।

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इस मामले की गंभीरता इस बात से भी बढ़ जाती है कि यूरेनियम के लापता होने की जानकारी तब सामने आई जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर लक्षित सैन्य कार्रवाई की थी, जिसका उद्देश्य वहां के गुप्त हथियार निर्माण कार्यक्रम को बाधित करना था। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बमबारी के बाद ईरानी वैज्ञानिक और सैन्य तंत्र ने संभवतः पहले से तैयार योजना के तहत यूरेनियम को किसी अज्ञात स्थान पर स्थानांतरित कर दिया होगा, ताकि अमेरिका की निगरानी से बचा जा सके। ऐसे कयास भी लगाए जा रहे हैं कि यह यूरेनियम संभवतः भूमिगत या मोबाइल प्रयोगशालाओं में छुपाया गया है, जिन्हें ट्रैक करना बेहद कठिन होता है। यदि यह आशंका सही साबित होती है, तो यह न केवल पश्चिम एशिया के लिए, बल्कि वैश्विक सुरक्षा संतुलन के लिए भी एक बेहद खतरनाक संकेत होगा, क्योंकि यह संकेत करता है कि ईरान अब और भी अधिक जटिल, परिष्कृत और गोपनीय परमाणु रणनीति पर काम कर रहा है।

दूसरी ओर, यह पूरा घटनाक्रम अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक कूटनीतिक चुनौती भी बनता जा रहा है। वाशिंगटन अब यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि क्या ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए जाएं, या फिर बातचीत के रास्ते को खुला रखा जाए ताकि संभावित परमाणु समझौते की एक नई नींव रखी जा सके। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ईरान इस यूरेनियम को एक ‘बर्गेनिंग चिप’ यानी सौदे की शर्तों में अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए इस्तेमाल कर सकता है — वह यह दर्शा सकता है कि यदि उसकी शर्तें नहीं मानी गईं, तो वह इस यूरेनियम को शस्त्रीकरण में परिवर्तित करने से पीछे नहीं हटेगा। इस खतरे के बीच यह सवाल भी उठता है कि क्या अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बार ईरान की मंशा और गतिविधियों को समय रहते भांप सकेंगे, या फिर दुनिया को एक और परमाणु संकट का सामना करना पड़ेगा।

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