भारत की बात (National)

स्मार्टफोन बनाम टैबलेट !

उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और नौकरशाही के बीच चल रही खींचतान अब सार्वजनिक रूप से सामने आ चुकी है। प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ ने अपनी ही सरकार के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मंत्रिपरिषद ने जनवरी 2022 में स्पष्ट रूप से 25 लाख छात्रों को स्मार्टफोन वितरित करने का निर्णय लिया था, लेकिन बाद में विभाग ने इस फैसले को पलटते हुए स्मार्टफोन की जगह टैबलेट देने का प्रस्ताव तैयार कर दिया। यह बदलाव न केवल छात्रों की जरूरतों के खिलाफ गया, बल्कि इससे सरकार को बड़ा आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा।

मंत्री नंदी का आरोप है कि इस निर्णय के चलते 3100 करोड़ रुपये का बजट लैप्स हो गया, यानी तय समय में राशि खर्च न होने के कारण वह वापस सरकार को लौटानी पड़ी। छात्रों को जो सुविधा मिलनी थी, वह अब तक अधूरी है। खास बात यह है कि छात्रों ने स्पष्ट रूप से स्मार्टफोन की मांग की थी, क्योंकि आज के दौर में अधिकांश एप्लिकेशन, क्लासेस, स्टडी मैटीरियल और संचार स्मार्टफोन के ज़रिए ही होता है। टैबलेट एक सीमित और भारी उपकरण है, जिसे छात्र कॉलेज या कोचिंग में ले जाना भी कठिन मानते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब स्पष्ट निर्देश और छात्रों की मांग मौजूद थी, तो अधिकारियों ने स्मार्टफोन के बजाय टैबलेट क्यों प्रस्तावित किए?

दूसरी ओर, विभागीय सूत्रों और अधिकारियों की अपनी सफाई है। उनका कहना है कि यह बदलाव छात्रों को “सोशल मीडिया की लत” से बचाने के मकसद से किया गया। उनके मुताबिक, स्मार्टफोन पर इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स और गेमिंग जैसी आदतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे पढ़ाई पर असर पड़ता है। टैबलेट का इस्तेमाल अपेक्षाकृत सीमित और शैक्षणिक प्रयोजनों तक सीमित रहता है, इसलिए यह कदम छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। हालांकि, यह तर्क मंत्री और कई अन्य जनप्रतिनिधियों को स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह फैसला मंत्रिपरिषद के निर्णय के खिलाफ है और पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है।

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इस मामले से उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या मंत्रिपरिषद के निर्णयों को अफसरशाही के स्तर पर बदला जा सकता है? क्या अधिकारियों की भूमिका अब निर्णय लेने वाली हो गई है, जबकि वे केवल क्रियान्वयन के लिए नियुक्त होते हैं? नंद गोपाल नंदी जैसे वरिष्ठ मंत्री का खुलेआम इस तरह की नाराज़गी जताना यह संकेत देता है कि अंदरूनी तौर पर संवाद और तालमेल की गंभीर कमी है। इससे एक ओर छात्रों का नुकसान हो रहा है, दूसरी ओर जनता के सामने सरकार की साख पर भी असर पड़ रहा है।

फिलहाल यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, और छात्रों के बीच भी नाराज़गी बढ़ रही है। अगर समय रहते इस विवाद का हल नहीं निकाला गया, तो यह मामला सरकार की योजनाओं की प्रभावशीलता और प्रशासनिक पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बन सकता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं—क्या वे मंत्रिपरिषद के फैसले को बहाल कर छात्रों को स्मार्टफोन उपलब्ध कराएंगे, या अधिकारियों के फैसले को ही प्राथमिकता देंगे?

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