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Supreme Courtभारत की बात (National)

1 अक्टूबर से जन्म-मृत्यु पंजीकरण के नियम बदलेंगे, 2 साल की देरी पर कोर्ट का आदेश जरूरी !

दिल्ली में 1 अक्टूबर से जन्म और मृत्यु के पंजीकरण से जुड़े नए प्रावधान लागू होने जा रहे हैं। इन बदलावों का उद्देश्य जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड को ज्यादा सटीक बनाना और पूरी पंजीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना है।

नए प्रावधानों के तहत जन्म और मृत्यु की घटनाओं को समयबद्ध तरीके से दर्ज करने पर ज्यादा जोर दिया जाएगा। यानी रिकॉर्ड तैयार करने और उसे सरकारी व्यवस्था में दर्ज करने की प्रक्रिया को निर्धारित समय-सीमा के भीतर पूरा करने की कोशिश होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उन मामलों में होगा, जहां जन्म या मृत्यु के पंजीकरण में दो साल से ज्यादा की देरी हो चुकी है। ऐसी स्थिति में अब सामान्य प्रक्रिया से सीधे पंजीकरण नहीं कराया जा सकेगा।

अगर किसी जन्म या मृत्यु की घटना को दर्ज कराने में दो साल से अधिक समय बीत चुका है, तो देरी से पंजीकरण के लिए न्यायिक आदेश जरूरी होगा। यानी संबंधित व्यक्ति को निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।

नए नियम के तहत ऐसे मामलों में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी। मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही दो साल से ज्यादा पुराने जन्म या मृत्यु के रिकॉर्ड का पंजीकरण किया जा सकेगा।

इसे आसान भाषा में समझें तो अगर किसी व्यक्ति का जन्म या किसी परिवार में हुई मृत्यु का रिकॉर्ड समय पर दर्ज नहीं हुआ और दो साल से ज्यादा समय निकल गया, तो अब सिर्फ आवेदन देकर रिकॉर्ड दर्ज कराने की प्रक्रिया पूरी नहीं होगी। पहले न्यायिक आदेश लेना होगा और उसके बाद पंजीकरण कराया जा सकेगा।

इस बदलाव के पीछे एक अहम उद्देश्य रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ाना है। जन्म और मृत्यु के रिकॉर्ड का इस्तेमाल पहचान, सरकारी योजनाओं, शिक्षा, संपत्ति, उत्तराधिकार और कई अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में होता है। ऐसे में रिकॉर्ड में देरी या गलत जानकारी को कम करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

नए प्रावधानों से एक तरफ समय पर पंजीकरण को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाने की कोशिश होगी, वहीं दूसरी तरफ लंबे समय से लंबित मामलों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया ज्यादा औपचारिक हो जाएगी।

यानी 1 अक्टूबर के बाद दो साल से ज्यादा पुराने जन्म-मृत्यु पंजीकरण के मामलों में सीधे रजिस्ट्रार के पास आवेदन पर्याप्त नहीं होगा—प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश जरूरी होगा। अब सवाल यह है कि नए नियम लागू होने के बाद पुराने लंबित मामलों के निपटारे की प्रक्रिया कितनी आसान या कठिन होती है।

written by :- Anjali Mishra

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