भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर अमेरिका के नए प्रतिबंध कानून का कितना असर?
अमेरिका में रूस पर दबाव बढ़ाने वाला नया प्रतिबंध कानून भारत के लिए भी अहम माना जा रहा है। अमेरिकी संसद ने ऐसा कानून पारित किया है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि, यह टैरिफ अपने-आप लागू नहीं होता; इसके लिए आगे राष्ट्रपति की कार्रवाई जरूरी होगी।
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है। रूस हाल के वर्षों में भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। सितंबर के शुरुआती 14 दिनों में रूसी क्रूड का भारतीय आयात करीब 1.42 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा, जो अगस्त के औसत से लगभग 30 प्रतिशत कम था।
अब अगर रूसी तेल खरीदने पर अतिरिक्त अमेरिकी टैरिफ या अन्य प्रतिबंधों का इस्तेमाल होता है, तो भारतीय रिफाइनरों के लिए रूसी क्रूड की खरीद और भुगतान व्यवस्था ज्यादा महंगी या जटिल हो सकती है। ऐसी स्थिति में भारत को रूस के अलावा इराक, सऊदी अरब, UAE और अन्य सप्लायरों से खरीद बढ़ानी पड़ सकती है। लेकिन अगर वैकल्पिक तेल महंगा पड़ता है, तो भारत के कुल आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।
इसका असर सिर्फ तेल कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर पेट्रोल-डीजल, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और उत्पादन लागत पर दबाव आ सकता है। आगे चलकर इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन कानून में दिए अधिकारों का इस्तेमाल किस तरह और किस स्तर पर करता है और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतें कैसी रहती हैं।
भारत सरकार ने साफ कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है और भारत बाजार की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग देशों से ऊर्जा की खरीद जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा है कि भारत ने अमेरिका के साथ इस मुद्दे के संभावित प्रभावों पर बातचीत की है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
एक और महत्वपूर्ण पहलू है वैश्विक तेल बाजार। अगर रूस से तेल की खरीद पर बड़े पैमाने पर रोक या अतिरिक्त लागत आती है, तो बाजार में उपलब्ध रूसी तेल की मात्रा प्रभावित हो सकती है। इससे दूसरे देशों को वैकल्पिक सप्लाई तलाशनी पड़ेगी और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बन सकता है। भारत जैसे बड़े आयातक के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर तत्काल बड़ा संकट आ गया है। कानून संसद से पारित हो चुका है, लेकिन 100 प्रतिशत टैरिफ भारत पर स्वतः लागू नहीं हुआ है। आगे अमेरिकी राष्ट्रपति की कार्रवाई, संभावित छूट और कानून के वास्तविक क्रियान्वयन से तस्वीर स्पष्ट होगी।
यानी असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत रूस से कितना तेल खरीदता है, बल्कि यह है कि अगर रूसी तेल पर अतिरिक्त अमेरिकी दबाव बढ़ता है तो भारत कितनी तेजी से वैकल्पिक सप्लाई जुटा सकता है और उसकी कीमत क्या होगी। आने वाले समय में यही भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तेल की कीमतों के लिए सबसे अहम पहलू रहेगा।
written by :- Anjali Mishra
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