होर्मुज के बाद अब एक और तेल रूट पर संकट!
अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच स्थित एक संकरा समुद्री रास्ता है। इसे आप दुनिया के समुद्री व्यापार के एक बड़े “गेटवे” की तरह समझ सकते हैं। एशिया और यूरोप के बीच जाने वाले कई जहाज इसी रूट का इस्तेमाल करते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि अल-मंदेब के रास्ते जहाज लाल सागर से होकर स्वेज नहर की तरफ जा सकते हैं। स्वेज नहर यूरोप और एशिया के बीच समुद्री दूरी को काफी कम करती है। इसलिए अगर अल-मंदेब पर सुरक्षा का खतरा बढ़ता है, तो उसका असर सिर्फ यमन या अरब देशों तक सीमित नहीं रहता।
अब हूतियों का दावा क्या है?
यमन के हूती विद्रोही लंबे समय से लाल सागर क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाने और समुद्री यातायात को प्रभावित करने की धमकियां देते रहे हैं। आपके दिए अपडेट के मुताबिक, उनका दावा है कि सऊदी अरब को छोड़कर दूसरे देशों के जहाजों को रोका जाएगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर जहाज तुरंत रुक जाएगा। लेकिन ऐसी धमकी से ही शिपिंग कंपनियों के लिए जोखिम और बीमा लागत बढ़ सकती है।
फिर तेल की कीमत क्यों बढ़ सकती है?
इसे एक उदाहरण से समझिए।
अगर जहाज सामान्य रास्ते से यूरोप जा सकता है, लेकिन सुरक्षा खतरे के कारण उसे अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप से घूमकर जाना पड़े, तो यात्रा काफी लंबी हो सकती है।
इससे:
रास्ता लंबा → यात्रा का समय ज्यादा → ईंधन खर्च ज्यादा → माल ढुलाई महंगी → सप्लाई चेन पर दबाव
और अगर इसी दौरान तेल की सप्लाई को लेकर भी चिंता बढ़ती है, तो बाजार में तेल की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव आ सकता है।
होर्मुज और अल-मंदेब में फर्क क्या है?
होर्मुज जलडमरूमध्य मुख्य रूप से फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
वहीं अल-मंदेब लाल सागर, स्वेज नहर और हिंद महासागर के बीच समुद्री व्यापार के लिए अहम है।
यानी दोनों जगह संकट पैदा होने पर दुनिया के सामने अलग-अलग लेकिन जुड़े हुए सप्लाई रूट का जोखिम पैदा होता है।
और यही वजह है कि होर्मुज के बाद अल-मंदेब की खबर को गंभीरता से देखा जा रहा है।
लेकिन एक जरूरी बात
यह कहना अभी सही नहीं होगा कि अल-मंदेब पूरी तरह बंद हो गया है या दुनिया में तेल की सप्लाई रुक गई है। हूतियों का दावा और वास्तविक समुद्री यातायात में कितना असर पड़ा है ये दोनों अलग बातें हैं।
असल चिंता यह है कि अगर जहाजों पर हमले या रोकने का खतरा बढ़ता है, तो कंपनियां जोखिम से बचने के लिए रास्ता बदल सकती हैं। इसका असर शिपिंग लागत, बीमा, डिलीवरी टाइम और कुछ मामलों में तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।
यानी कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि “एक समुद्री रास्ते पर खतरा है।”
बड़ी कहानी ये है कि दुनिया की ऊर्जा और व्यापार व्यवस्था कुछ बेहद महत्वपूर्ण समुद्री chokepoints पर निर्भर है। अगर एक के बाद दूसरा रास्ता भी तनाव में आता है, तो उसका असर हजारों किलोमीटर दूर बैठे देशों और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
written by:- Anjali Mishra
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