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‘मसान की होली’ पर मचा घमासान! आस्था, परंपरा या मर्यादा काशी में उठे बड़े सवाल !

वाराणसी एक बार फिर सुर्खियों में है, और वजह है यहां के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली ‘मसान की होली’, जिसे काशी की अनोखी परंपराओं में गिना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव की नगरी में जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर मिट जाता है, इसलिए यहां श्मशान घाट पर भी रंगों का उत्सव मनाया जाता है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा को आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाता रहा है, लेकिन अब इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है, जिसने धार्मिक आस्था और सामाजिक मर्यादा पर नई बहस छेड़ दी है।

काशी में ‘मसान की होली’ सिर्फ रंग खेलने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक प्रतीक माना जाता है यह संदेश कि मृत्यु भी जीवन का उत्सव रोक नहीं सकती। श्मशान घाट पर राख और गुलाल के साथ होली खेलने की परंपरा को कुछ लोग आध्यात्मिक मुक्ति और वैराग्य से जोड़ते हैं। कई साधु-संत इसे शिव की नगरी की विशेष पहचान बताते हैं, जहां मृत्यु को भी उत्सव का हिस्सा माना जाता है। यही कारण है कि हर साल देश-विदेश से लोग इस अनोखे आयोजन को देखने पहुंचते हैं।

हालांकि इस बार विवाद इसलिए बढ़ गया क्योंकि कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या श्मशान जैसी गंभीर जगह पर सार्वजनिक उत्सव मनाना उचित है। आलोचकों का कहना है कि परंपरा के नाम पर संवेदनशीलता और मर्यादा का ध्यान रखना भी जरूरी है, खासकर उन परिवारों के लिए जो अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने वहां आते हैं। उनका तर्क है कि आस्था के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।

दूसरी तरफ परंपरा के समर्थकों का कहना है कि काशी की पहचान ही उसकी अनोखी धार्मिक परंपराएं हैं, और ‘मसान की होली’ उनमें से एक है। उनका मानना है कि बाहरी नजर से इसे समझना आसान नहीं है, क्योंकि काशी की आध्यात्मिक परंपराएं सामान्य सामाजिक मानकों से अलग हैं। उनके अनुसार, यह आयोजन सदियों से होता आया है और इसे रोकना सांस्कृतिक विरासत पर चोट होगा।

इस विवाद ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है क्या परंपराओं को समय के साथ बदलना चाहिए या उन्हें उसी रूप में बनाए रखना चाहिए जैसे वे चली आ रही हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि हर परंपरा समय के साथ नए संदर्भों में देखी जाती है, इसलिए संवाद जरूरी है ताकि आस्था और संवेदनशीलता दोनों का संतुलन बना रहे।

कानूनी पहलू भी इस बहस का हिस्सा बन गया है। कुछ लोगों का कहना है कि सार्वजनिक स्थान और श्मशान घाट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आयोजन को लेकर प्रशासन की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। वहीं प्रशासन आमतौर पर शांति और व्यवस्था बनाए रखने पर जोर देता है, ताकि किसी प्रकार का टकराव न हो।

धार्मिक दृष्टि से देखें तो काशी को मोक्ष की नगरी माना जाता है, जहां मृत्यु को अंत नहीं बल्कि मुक्ति का मार्ग समझा जाता है। इसी दर्शन के कारण यहां जीवन के उत्सव और मृत्यु के संस्कार साथ-साथ चलते हैं। ‘मसान की होली’ भी इसी सोच का विस्तार मानी जाती है, जो जीवन की नश्वरता और उत्सव की निरंतरता दोनों को दर्शाती है।

अब यह मुद्दा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की बहस बन चुका है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि समाज और प्रशासन मिलकर इसका समाधान कैसे निकालते हैं परंपरा को उसी रूप में जारी रखा जाएगा या उसमें कुछ बदलाव किए जाएंगे।

फिलहाल इतना तय है कि काशी की ‘मसान की होली’ ने एक बार फिर देशभर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है और यह बहस आने वाले दिनों में और गहराने की संभावना है।

written by :- Anjali Mishra

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